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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

भिखारियों की बेटियां भगवान का रूप नहीं होतीं..(भगवान तो मंदिर में मिलता है?)

नवरात्रि का पावन त्यौहार है। इस खास अवसर पर हर घर में विशेष पकवान बन रहे हैं। लोग अपने उपवास और व्रत को लेकर उत्साहित हैं, कोई साबूदाने की कुरकुरी टिकिया और सिंघाड़े के आटे का हलवा बना रहा, तो कोई मखाने, फल और बादाम-काजू जैसे महंगे ड्रायफ्रूट्स से अपनी थाली सजा रहा। मंदिर के आसपास और बाजारों में रौनक देखते ही बनती है।

लेकिन, मेरी नजर एक कोने पर पड़ी। एक लगभग तीस-बत्तीस साल की महिला, जिसके बाल बिखरे हुए थे, चेहरे पर धूप और तंगहाली की गहरी रेखाएं थीं और तन पर एक मैला-कुचैला साफा था, जमीन पर बैठी थी। उसकी गोद में चार-पांच साल की एक नन्ही सी बिटिया थी, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें इस दुनिया की क्रूरता से बिल्कुल अनजान, अपनी मासूमियत से बस टकटकी लगाए देख रही थीं।

उनके सामने एक टूटी हुई एल्युमिनियम की थाली रखी थी। उस थाली में सुबह की बासी दाल के कुछ सूखे छींटे, एक सूखी हुई, कड़क रोटी और प्लेट के कोने में रखा हुआ आम के अचार का एक काला टुकड़ा पड़ा था।

महिला उसी सूखी रोटी को अपने हाथों से छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर, बासी दाल में भिगोकर अपनी उस मासूम बिटिया को खिला रही थी। बच्ची कभी रोटी का सूखा टुकड़ा चबाती तो उसका जबड़ा दर्द से भींच जाता, लेकिन भूख इतनी विकट थी कि वो चुपचाप खाए जा रही थी।

उस दृश्य को देखकर मेरा कलेजा कांप उठा। एक तरफ पूरा शहर नवरात्रि के विशेष व्यंजनों और उत्सव में डूबा था, और दूसरी तरफ यह माँ और बेटी इस चिलचिलाती धूप में, भगवान के द्वार के ठीक सामने, सूखी रोटी और अचार से अपना पेट भरने को मजबूर थीं।

मुझसे रहा नहीं गया। पास की दुकान से एक बड़ा बिस्किट का पैकेट और चिप्स लाए और उस नन्ही बिटिया के हाथ में थमा दिए। उस बच्ची के चेहरे पर जो हल्की सी चमक आई, वो इस बात का सुबूत थी कि उसने बहुत दिन में शायद पहली बार कुछ ऐसा देखा था जो किसी त्यौहार जैसा महसूस हुआ हो।

फटे हुए पल्लू से अपनी आँखें पोंछते हुए उसने कहा—

दान तो लोग देते हैं बाबूजी, कोई दो-पाँच रुपए फेंक देता है, तो कोई बासी रोटियां दे देता है। लेकिन... लेकिन इंसानियत से बात करने वाले आप जैसे भले लोग बहुत कम मिलते हैं।

लोग जब हमें दान देते हैं, तो ऐसे फेंकते हैं जैसे कोई कीड़ा हो। ऐसे पैसे और सामान देते हैं कि हमें छू तक न लें, कहीं हम उनकी जाति या उनके शरीर को गंदा न कर दें। जैसे हम इंसान नहीं, कोई अछूत बीमारी हों।

जब हमने उन्हें कुछ पैसे देने चाहे, तो उस माँ ने हाथ पीछे खींचते हुए कहा—

पैसे नहीं चाहिए बाबूजी, आपने जो इज्जत से बात की और मेरी बिटिया को अपने हाथों से बिस्किट दिलाया, वही हमारे लिए सबसे बड़ा प्रसाद है।
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