आदिवासियों में 'लिव-इन रिलेशनशिप' - आदिवासी समाज का सच?(जहाँ 'ब्रेकअप' के बाद रोना-धोना नहीं...)
गाँव की चौपाल पर बैठे या किसी दूर-दराज के आदिवासी इलाके में जब महिलाओं से खुलकर बात होती है, तो कई बार ऐसे सच सामने आते हैं जो हमारी तथाकथित "सभ्य" और मुख्यधारा की दुनिया की हर परिभाषा को उलट देते हैं।
जब हमने ज़मीन पर उतरकर आदिवासियों के बीच पड़ताल की, तो एक ऐसा सच सामने आया जो मुख्यधारा के समाज की हर परिभाषा को पलट देता है!
अक्सर शहरी समाजों में बिना पारंपरिक ब्याह के साथ रहने (लिव-इन) की परंपरा को नैतिकता के विरुद्ध माना जाता हैं—इसे "अवैध संबंध" या "अनियमितता" का नाम दिया जाता है।
यहाँ जो दिखता है, वह सदियों से चली आ रही एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ व्यक्ति की आज़ादी और आपसी सहमति सर्वोपरि है।
बातचीत के दौरान जब रिश्तों और आज़ादी के इस पहलू पर बात छिड़ी, तो एक आदिवासी महिला ने बड़े सहज अंदाज में कहा—
"जब मन नहीं मिलता, तो ज़बरदस्ती रिश्ते को खींचने का क्या मतलब? आपसी सहमति से अलग हो गए, अपना नया साथी चुन लिया, इसमें किसी का क्या बिगड़ता है?"
पितृसत्तात्मक समाज के दबावों से मुक्त, यहाँ महिलाओं को अपना जीवनसाथी चुनने और बदलने की पूरी आज़ादी मिलती है, जिसकी कल्पना मुख्यधारा की दुनिया में करना भी मुश्किल है।
इन समुदायों की जीवनशैली प्रकृति के सबसे करीब है। उनका मानना है कि जैसे प्रकृति में बदलाव एक निरंतर प्रक्रिया है, वैसे ही इंसानी भावनाएं, प्रेम और आकर्षण भी सहज हिस्से हैं।
शहरों की तरह यहाँ रिश्ता टूटने पर न तो कोई 'सामाजिक कलंक' का डर होता है और न ही वह भारी-भरकम संपत्ति और दहेज का खेल, जिसके टूटने पर इंसान कोर्ट-कचहरी के चक्कर में घुटता रहे।
रिश्तों को किसी दमघोंटू जेल की तरह नहीं, बल्कि आपसी रजामंदी के धागे से जोड़ा जाता है। बिना पारंपरिक सात फेरों के साथ रहना यहाँ कोई गुनाह नहीं, बल्कि पूरी तरह सामाजिक रूप से स्वीकृत जीवनशैली है।
पड़ताल का एक और सच यह भी है कि आज आधुनिकता और प्रशासनिक दबाव के इस दौर में, कई आदिवासी समुदायों पर भी बाहरी रूढ़िवादी सोच का शिकंजा कसता जा रहा है। अपनी ही अनूठी और प्रगतिशील व्यवस्थाओं को अब कुछ लोग बाहरी चश्मे से देखने लगे हैं।
