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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

पापा, हमारे नए कपड़े और पटाखे कहाँ हैं?

जब भी त्योहारी सीजन की सुगबुगाहट शुरू होती है, बाज़ारों में दीयों की कतारें सजती हैं और हवा में आतिशबाजी की गंध घुलने लगती है, तब हर घर में एक अलग ही उत्साह होता है।

नए कपड़ों की खुशबू, डिब्बों में सजी मिठाइयाँ और बच्चों की जिद—यह सब मिलकर दिवाली का असली रंग जमाते हैं। लेकिन इस रंगीन तस्वीर के पीछे एक ऐसा कोना भी है, जहाँ उम्मीदों और जिम्मेदारियों का एक अलग ही संघर्ष चलता रहता है।

जब हम मोबाइल स्क्रीन पर किसी खबर को देखते हैं, तो हमें सिर्फ एंकर या रिपोर्टर का चेहरा नजर आता है। लेकिन उस चेहरे के पीछे एक पूरा परिवार होता है, एक बच्चा होता है जो अपने पापा से पूछता है— "पापा, हमारे नए कपड़े और पटाखे कहाँ हैं?"

पत्रकार की दिवाली!" यह महज एक सवाल नहीं है, बल्कि उस हकीकत का आईना है जो मीडिया की चमक-दमक के पीछे कहीं छिप जाती है।

अक्टूबर का महीना आते ही मौसम में एक हल्की सी सिहरन घुल जाती है। शामें जल्दी ढलने लगती हैं और घरों में सफाई, रंगाई-पुताई और खरीदारी की योजनाएं बनने लगती हैं। लेकिन एक पत्रकार के घर में यह महीना कैलेंडर की तारीखों से ज्यादा 'असाइनमेंट' और 'ब्रेकिंग न्यूज' के हिसाब से चलता है।

आम आदमी के लिए दिवाली यानी छुट्टी और परिवार का मिलन। लेकिन एक पत्रकार के लिए अक्टूबर-नवंबर का मतलब होता है—"सालाना विज्ञापन का टारगेट"।

एक पत्रकार के लिए त्योहारी सीजन किसी जंग के मैदान से कम नहीं होता। एक तरफ त्योहारी बाज़ारों की रौनक की रिपोर्टिंग, मिलावटखोरों पर छापे, त्योहारी सुरक्षा व्यवस्था, और वीआईपी दौरों का कवरेज; तो दूसरी तरफ घर पर बैठी उनकी पत्नी और बच्चे, जो हर साल की तरह इस बार भी उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद इस बार पापा दिवाली पर थोड़ा जल्दी घर लौटेंगे।

सुबह सात बजे घर से निकलते और रात के दो-तीन बजे कब बज जाते, उन्हें खुद पता नहीं चलता। उनकी जेब में हमेशा एक छोटा सा नोटपैड, पेन और मोबाइल का पावर बैंक रहता है। लेकिन जिस चीज की सबसे ज्यादा कमी खलती है, वह था परिवार के लिए वक्त।

बड़े अखबारों के पत्रकारों को तो फिर भी विज्ञापन विभाग का सपोर्ट होता है, लेकिन छोटे कस्बों और जिला स्तर के संवाददाताओं की रोजी-रोटी का आधा हिस्सा इन्हीं विज्ञापनों के कमीशन पर टिका होता है। त्योहार की असल भागदौड़ दीयों की सजावट के लिए नहीं, बल्कि उस विज्ञापन के बिल को पास कराने के लिए होती है, जिससे घर का राशन और बच्चों के पटाखे आने हैं।

एक सामान्य पत्रकार की तनख्वाह, काम के घंटे और सामाजिक अपेक्षाएं—इन तीनों के बीच एक बहुत बड़ा विरोधाभास होता है। समाज में रुतबा ऐसा कि बड़े-बड़े अधिकारी और राजनेता मिलने के लिए समय मांगें, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ऐसी कि कई बार महीने के आखिर में बच्चों की स्कूल की फीस या त्योहारी खर्चों के लिए हाथ तंग हो जाए।

पत्नी जो खुद एक गृहणी होने के साथ-साथ परिवार की अर्थशास्त्री भी है, जानती है कि पति कितनी मानसिक और शारीरिक थकान के साथ काम कर रहे हैं। उसने किसी बड़ी चीज की मांग नहीं की। वे जानती हैं कि उनके पति का पेशा उन्हें शोहरत तो देता है, लेकिन समृद्धि की गारंटी नहीं देता। फिर भी, एक पत्नी के रूप में, वे चाहती हैं कि उनका बेटा भी बाकी बच्चों की तरह हँसते-खेलते दिवाली मनाए।

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह स्तंभ समाज की हर उस आवाज को बुलंद करता है जो अनसुनी रह जाती है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इस स्तंभ को थामने वाले इंसानों की अपनी निजी जिंदगी किस दौर से गुजरती है?

शायद इस दिवाली, हमें न सिर्फ उन खबरों को सराहने की जरूरत है जो हमारे तक पहुँचती हैं, बल्कि उन लोगों के मानवीय संघर्ष को भी समझने की जरूरत है जो बिना किसी छुट्टी के, हर मौसम और हर त्योहार में हमारे समाज के प्रहरी बने रहते हैं। और यही है एक पत्रकार की सच्ची, अनकही और संघर्षपूर्ण दिवाली!

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