(वृक्षारोपण और गबन साथ साथ चल रहा है?)
ऐसा तो नहीं कहीं कि, पेड़ 'झोंझा' में लग रहे हैं और 'झाड़' पूरे खोबी में कट रहे हैं?
ग्राम पंचायत खोबी का तो जवाब नहीं! यहाँ एक तरफ तो पर्यावरण संवर्धन की 'गंगा' बह रही है और दूसरी तरफ सरकारी खजाने की 'गंगा सफाई' का महा-अभियान चल रहा है!
एक तरफ प्रदेश के पंचायत मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल खोबी के ग्राम झोंझा में नर्मदा तट पर 2100 पौधे लगाकर हरियाली ला रहे हैं
तो दूसरी तरफ पंचायत में बैठे जिम्मेदार इस हरियाली के पीछे अपनी गबन की कुल्हाड़ी चमका रहे हैं!
फलदार पौधे लगाने का एक बहुत ही शानदार, उदात्त सरकारी उत्सव चल रहा है। पर्यावरण को बचाने की, धरती को हरा-भरा करने की खूबसूरत कसमें खाई जा रही हैं।
लेकिन ठीक उसी वक्त, उसी इलाके की ग्राम पंचायत खोबी से एक दूसरी तस्वीर निकलती है और वह तस्वीर आपसे कुछ सवाल पूछती है।
मिलिए खोबी पंचायत के सबसे अनमोल रत्न 'शोभेंद्र शर्मा' से! पंचायत वालों ने इन्हें ऐसा जादूगर बनाया है कि शक्तिमान भी शरमा जाए!
रूप 1 पोर्टल पर ये "दैनिक वेतन भोगी मजदूर" हैं और इनके नाम पर बिल भी पास हो जाता है! लेकिन जब मस्टर रोल की ज़मीनी कॉपी उठाओ तो 14 मजदूरों की लिस्ट में से शोभेंद्र बाबू का नाम ऐसे गायब है जैसे गधे के सिर से सींग!
रूप 2 अगली ही स्क्रीन पर जादू होता है! वही शोभेंद्र अचानक "लघु दुकानदार" की गद्दी पर विराजमान होकर गिट्टी का बिल भुना रहे होते हैं!
क्या यह वृक्षारोपण सिर्फ इसलिए हो रहा है ताकि मीडिया में फोटो चमके और पीछे से 'शोभेंद्र' जैसे कागजी किरादारों के नाम पर फर्जी बिल चमकाए जा सकें?
विडंबना देखिए कि जिस वक्त खोबी पंचायत के पन्नों पर यह कागजी जादूगरी और गबन का खेल चल रहा है, ठीक उसी पंचायत की सीमा में मंत्री महोदय वृक्षारोपण की पट्टिकाएं चमका रहे हैं।
तो सवाल यह नहीं है कि पौधे कितने लगे। सवाल यह है कि मंत्री जी के साए में, उनकी नाक के नीचे यह 'कागजी हरियाली' और 'वित्तीय सूखा' एक साथ कैसे फल-फूल रहा है?
क्या इस देश में पारदर्शिता का मतलब सिर्फ कैमरों के सामने पौधे लगाना रह गया है, और पीछे से सरकारी तिजोरी पर कुल्हाड़ी चलाना?
सोचिए मत बस देखते रहिए, क्योंकि खोबी पंचायत का यह कारनामा लोकतंत्र की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाने लायक है!
