शहर में नवरात्रि का पावन पर्व है, हर तरफ माता के पंडालों की रौनक है, भव्य सजावट है और जगह-जगह प्रसाद बँट रहा है। पंडाल संचालकों ने बाकायदा डस्टबिन भी रखवाए हैं... लेकिन अफसोस, हमारे यहाँ के कुछ नागरिकों का 'सिविक सेंस' शायद घर पर ही छूट गया है!
हालात यह हैं कि प्रसाद के नाम पर छप्पर फाड़ के खाया, और केले के छिलके, दोने-पत्तल ठीक सड़क के बीचों-बीच या जहाँ खड़े थे, वहीं फेंक दिए।
ज़रा सोचिए आपकी इस सड़े हुए छिलके और कचरे फेंकने की आदत से दूसरों की जान पर बन आई है!
जो आस्थावान श्रद्धालु नंगे पैर माता के दर्शन को निकल रहे हैं, वे इन छिलकों पर फिसलकर चोटिल हो रहे हैं। सड़कों पर से गुजरने वाले दोपहिया वाहन चालकों की गाड़ियां अनियंत्रित होकर स्लिप हो रही हैं।
मेरी आँखों के सामने एक स्कूटी सवार महिला और उसके बच्चे बाल-बाल बचे हैं, भगवान का शुक्र है कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ!
और यह कोई इक्का-दुक्का या पहली बार की घटना नहीं है, यह हमारा वह स्थायी रवैया बन चुका है जो हर बड़े त्यौहार पर सड़कों पर दिखता है।
हम शहर को सजाने में करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, लाइटिंग ऐसी करते हैं कि आसमान शर्मा जाए। लेकिन जब बात अपनी उस ज़मीन को साफ रखने की आती है, जिस पर हम खुद चलते हैं, तो हम एकदम लाचार हो जाते हैं।
सवाल यह उठता है कि आखिर कब जागेगा हमारा यह सोया हुआ 'सिविक सेंस'? क्या सफाई की पूरी ठेकेदारी सिर्फ प्रशासन और पंडाल वालों की है?
शहर की इस बेपरवाह जनता से बस यही अपील है—भक्ति अपनी जगह है, लेकिन इंसानियत और अक्ल का परिचय देना भी जरूरी है। अगली बार प्रसाद खाएं, तो जरा नजर डस्टबिन पर भी डाल लें!
