जिला पंचायत में अंधेर राज? गजेंद्र नागेश को पद से हटाओ,भ्रष्टाचार भगाओ!: नरसिंहपुर
सीईओ गजेंद्र नागेश की भ्रष्टाचार के मामलों पर चुप्पी से साफ जाहिर हो रहा है की, जिला पंचायत अधिकारी गजेंद्र नागेश ने भ्रष्टाचारी सरपंच, सचिव और जीआरएस को संरक्षण दिया है,जिसका नतीजा यह है की,अब भ्रष्टाचार के मामलों की शिकायतों को कूड़े के ढेर में फेक दिया गया है?
ग्रामीणों की समस्याओं को पूरी तरह से अनसुना किया जा रहा है, जिला पंचायत में इस समय अंधेर राज चल रहा है! तंत्र में बैठे कारिंदों का जमीर मर गया है और वे ढिठाई पर उतर आए हैं! नतीजतन कोई भी ग्रामीण सुरक्षित नही है! कब,कैसे,कोई इन ग्रामीणों का हिस्सा डकार ले या इनके नाम पर गबन कर ले, ग्रामीण इस खौफ के साए में जी रहे है।
वैसे तो जांच एजेंसी किस तरह की जांच करती हैं यह बात आज किसी से छिपी हुई नहीं है। नरसिंहपुर जिले की ग्राम पंचायतों में जमकर भ्रष्टाचार किए जाने की अनेकों शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन जिला प्रशासन कार्यवाही के नाम पर खानापूर्ति करने की अपनी शैली से बाज नहीं आता है!
गबन और भ्रष्टाचार के अधिकतर मामलों में स्थानीय प्रशासन कार्यवाही की बजाय मामले पर पर्दा डालने में अधिक आतुरता दिखाई देता है!
कहते हैं कि कलेक्टर से लेकर जनप्रतिनिधि और अधिकारियों तक लिफाफे नही बल्कि सूटकेस पहुंचना इसकी मुख्य वजह है? अब इस बात में कितनी सच्चाई है आम जनता इस सच्चाई से वाकिफ है!
बात सिर्फ इतनी सी नही है, बल्कि ऐसा लगता है जैसे कि अब प्रशासन भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए खुलकर सामने आ गया है। कुछ अधिकारियों ने तो अपने चाटुकार और समर्थक नियुक्त कर रखे हैं, इधर शिकायत दर्ज नहीं हुई की ये चापलूस समर्थक समझौते से लेकर प्रलोभन और दबाव बनाने की अपनी कोशिशों में जुट जाते हैं।
भ्रष्टाचार के मामलों में जनपद सीईओ, ठेकेदार, सरपंच, बैंक अधिकारियों पर जांच करने में जांच अधिकारियो के हाथ पांव ठंडे पड़ जाते है, क्यों कि ये बात वे अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि दरी का एक भी सिरा उधड़ने लगा तो फिर पूरी दरी ही चिंदी चिंदी हो जायेगी।
भ्रष्टाचार जिले में अपने चरम पर है! शायद यह मान लिया गया है कि, सरकारी पैसा सिर्फ सरकार के कारिंदों और सरकारी अधिकारी ,कर्मचारियों का है?
आम जनता की गाढ़ी मेहनत की कमाई के भारी भरकम टैक्स से मौज मस्ती करने वालों को यह नही भूलना चाहिए कि सत्ता और समय परिवर्तन शील है। आज एसी रूम और पार्टियों को एंजॉय करने वाले कल सलाखों के पीछे भी हो सकते हैं लेकिन वे जानते हैं कि भेड़ चाल चलने वाली जनता को आंकड़ों , प्रलोभन और आश्वासनों के जरिए किस तरह भ्रमित किया जा सकता है!
एक आम नागरिक को कितना डराकर जिंदा रखा जा सकता है, और कब तक?जब एक नागरिक ही विकास से वंचित हो तब गांव, कस्बे, शहर कैसे विकास कर सकता है?
गरीब को उसके अधिकार से वंचित कर उसका हिस्सा हड़पने की कला ने अनेको ऐसे उपाय ढूंढ रखे हैं की आप भी सुने तो दातों तले उंगलियां दबाने से नहीं रह पाएंगे।
पूरा तंत्र मिलकर भ्रष्टाचार को पोषित कर रहा है! उस पर भी बेशर्मी का आलम यह है कि हमसे कहा जाता है कि, क्या stringer24news ने जिले से भ्रष्टाचार को मिटाने का ठेका ले रखा है? जब जांच करने वाले ही ऐसी बाते कहेंगे तो आप समझ जाइए की भ्रष्टाचार की शिकायत का क्या होता होगा।
जिसे देखो उसकी जुबान पर बस एक ही बात रहती है, कि आप व्यर्थ परेशान हो रहे हैं,पैसा ऊपर तक गया है,कुछ होने वाला नहीं है। भ्रष्टाचारियों का कुछ नही होगा! मुझे हैरत होती है ये बात कहते समय अधिकारियों की निगाहें भी नीची नही होती।
भले ही शासन की मंशा गांव और ग्रामिणो के विकास की हो और यह दावे किए जाते हों की, गांव और ग्रामीणों का विकास किया जा रहा है, लेकिन धरातलीय स्तर पर यह भी उतना ही सत्य है कि, भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामले भी ग्राम पंचायतों से ही अक्सर सामने आते रहते हैं।
शासन प्रशासन तो कहता है कि सरपंच सेवा करने के लिए कुर्सी पर आते हैं और खुद सरपंच भी सेवा का नाम लेकर ही कुर्सी पर आते हैं लेकिन सच्चाई इसके विपरित है। हम यह तो नही कहेंगे की सभी सरपंच भ्रष्ट हैं लेकिन अधिकांश मामलों में देखने में आया है कि ग्राम सरपंच की भ्रष्टाचार,रिश्वतखोरी,अतिक्रमण, हेर फेर में संलिप्तता पाई जाती है।
ऐसी कौन सी योजना है जिसे पलीता नही लगाया जाता है?गबन और हेर फेर के इस खेल में तकरीबन हर योजना को बर्बाद कर दिया जाता है।
मनरेगा से मजदुरी हो या फिर सरकारी अनाज का वितरण,निर्माण कार्य हों या फिर पेंशन और संबल योजना की राशि गरीब के हिस्से को हड़पने के लिए हर तरह के हथकंडे आजमाए जाते हैं।
बंद कैमरे के पीछे सरपंच,सचिव, ग्राम रोजगार सहायक और अधिकारी यह स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं कि भ्रष्टाचार और गबन आज की जरुरत बन गया है। हमने अपने स्टिंग आपरेशन के दौरान हर बार यह खुलासा किया कि कैसे यह लेन देन का खेल चलता है और मामले फाइलों में दफन कर दिए जाते हैं।
कोई कहता है आटे में नमक के बराबर जायज है तो कोई कहता है कि हम क्या यहां नाम मात्र के वेतन पर काम करने के लिए लाखों रुपए चुनाव में खर्च करके आए हैं। आप आंकलन करने पर पाएंगे कि, पंचायत चुनाव में प्रधान पद के प्रत्याशियों ने दो - दो, तीन - तीन लाख तक की राशि बहाई है। जो लोग इस धन पर बुरी नज़र के साथ चुनाव में आए हैं, वे इसका सही इस्तेमाल कैसे कर पाएंगे?
पंचायत में सिर्फ सरपंच,सचिव, ग्राम रोजगार सहायक और अधिकारी हेर फेर करते हैं ऐसा भी नहीं है।
गबन के इस खेल की चैन बहुत लम्बी है,इसमें ठेकेदार, मेट, इंजीनियर,और बैंक कर्मी भी लिप्त होते हैं। प्रशासन भ्रष्टाचार और गबन की शिकायतों को गम्भीरता से ले तो सुशासन की अवधारणा साकार हो सकती है।सरकार अपने पैसे के एक बड़े भाग का वितरण ज़मीन पर पंचायत प्रधानों के ज़रिए करती है।विकास के लिए सीधी आने वाली यह राशि प्रधान पद पर बड़े और रसूखदार लोगों को ललचाती है।
प्रशासन का रवैया देखकर ऐसा लगा जैसे जिम्मेदारों ने मामले को अनसुना करने के लिए कानों में रुई ठूस ली है शायद इस वजह से ग्रामीणों की आवाज को अनदेखा करना ज्यादा आसान हो गया होगा!
जो योजना व्यक्ति मूलक थी "मतलब जिसका सीधा संबंध व्यक्तिगत तौर पर आम हितग्राही से है" और उस योजना में गबन करने वालों की साजिश का शिकार बने ग्रामीणों को उनका हक दिलाने में जिला प्रशासन नाकाम है?
क्या वाकई करप्शन ने पूरे सिस्टम को इतना खोखला कर दिया है की इंसान के अंदर की इंसानियत मर गई और वह सिर्फ पैसा कमाने की मशीन बनकर रह गया है?
कोई गांव वाला सिर्फ इस वजह से परेशानी में है क्यों की सिस्टम उसे न्याय दिलाने में असमर्थ है।यह कैसी विडंबना है? और यह कैसी न्याय व्यवस्था है?
आखिर कौन हैं वो लोग जो इतना घबराए हुए हैं की जांच ही नही होने देना चाहते हैं?
यदि आप सोचते हैं की गबन के मामले में अधिकारियों की संलिप्तता नहीं होगी या फिर मामला अधिकारियों की जानकारी से बाहर था तो आपकी जानकारी के लिए हम यह बता दें की ऐसा नही है,इसके साक्ष्य मौजूद हैं कि अधिकारियों की नाक के नीचे सब चल रहा था फिर भी जानबूझकर चुप्पी साधी गई थी।
