बेदू बलराम का उतरेगा 'पति-राज' का नशा? (सरपंच पूजा... 7 साल कारावास की सजा... संपत्ति को कुर्क करके नीलाम...)
मध्य प्रदेश की ग्राम पंचायत बेदू का यह कारनामा किसी घोटाले से कम नहीं है!
Stringer24News द्वारा एक्सेस किए गए पंचायत पोर्टल के आंकड़ों और बिलों से पता चलता है कि किस प्रकार कागजी औपचारिकताओं को ताक पर रखकर सरकारी फंड का आहरण किया जा रहा है।
"जरा इन विजुअल्स को देखिए। 30 मई और 1 जुलाई के ये बिल गवाही दे रहे हैं कि कैसे कागजों की चिंदियों पर पंचायत का खजाना खाली किया जा रहा है।
यहां सादे पन्नों और हाथ से लिखी पर्चियों पर लाखों रुपये के बिल पास हो रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यक्रम के नाम पर चाय-नाश्ते, टेम्पर परिवहन और स्टेशनरी के फर्जी बिलों से सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है।
हद तो तब पार हो जाती है जब पंचायत का चपरासी पोर्टल पर 'जनसामान्य' बताया जाता है और उसके नाम पर भुगतान निकाल लिए जाते हैं!
"यही नहीं, सरकारी स्कूल की जमीन पर अतिक्रमण हटाने में पंचायत के हाथ-पावर क्यों फूल रहे हैं? क्या इन अवैध कब्जों के पीछे कोई मोटा कमीशन का खेल चल रहा है?
जब स्थानीय लोकतंत्र की धुरी ही कागजों के फर्जीवाड़े और अनधिकृत नियंत्रण पर टिक जाए, तो ग्रामीण विकास की योजनाओं का पैसा जमीन तक कैसे पहुंचेगा?
जाहिर सी बात है, विभागीय जांच में ये तमाम आरोप और वित्तीय अनियमितताएँ साबित होने पर, सरपंच पूजा चौधरी और इस खेल में शामिल अन्य लोगों पर कानून का शिकंजा ऐसा कसेगा कि अच्छे-अच्छों की नींद उड़ जाएगी।
मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम के तहत यदि वित्तीय गबन या पदीय दुरुपयोग साबित होता है, तो सबसे पहले सरपंच की कुर्सी तुरंत छीनी जाएगी।
मामला सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता बल्कि कानून के मुताबिक उन्हें आगामी कई सालों या आजीवन के लिए किसी भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
सादे पन्नों पर फर्जी बिल पास करना, चपरासी को 'जनसामान्य' दिखाकर सरकारी धन डकारना और फर्जी हस्ताक्षर के जरिए सरकारी खजाने को चपत लगाना - यह सीधे तौर पर धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर संज्ञेय अपराध है।
इसमें बिना वारंट गिरफ्तारी का प्रावधान है। यदि धाराएं साबित हुईं, तो 7 साल तक की कठोर कारावास की सजा हो सकती है, जिसमें जमानत मिलना भी लोहे के चने चबाने जैसा हो जाता है।
घोटाले की एक-एक पाई सरकारी तिजोरी से वसूल की जाएगी। यदि आरोपी जुर्माने की रकम या गबन किया गया पैसा नहीं चुका पाते हैं, तो प्रशासन उनकी चल-अचल संपत्ति को कुर्क करके नीलाम कर सकता है। कोर्ट और प्रशासन के चक्कर काटते-काटते पुश्तैनी जमीनें तक बिकने की नौबत आ जाती है।
कानून की नजर में भले ही मुहर सरपंच के नाम की हो, लेकिन यदि जांच में यह साबित हुआ कि सत्ता का अवैध रिमोट कंट्रोल उनके पति बलराम या किसी अन्य के हाथ में था और वे अवैध तरीके से वित्तीय निर्णयों को प्रभावित कर रहे थे, तो सह-आदतन अपराधी के रूप में उन्हें भी सीधे जेल की हवा खानी होगी। 'पति-राज' का नशा उतरने में देर नहीं लगेगी।
हांलांकि जब ग्रामीण इन बिलों को देखते है, तो वह सवाल पूछते हैं कि, "क्या ये तमाम कारनामे करने वाले कभी जेल जाएंगे?"
लेकिन सिस्टम की दीवारें इतनी मजबूत हैं कि वहां गूंजती आवाजें अक्सर दम तोड़ देती हैं। फिर भी, बेदू पंचायत के इन बिलों ने यह साबित कर दिया है कि कागजों पर लोकतंत्र जितना चमकदार दिखता है, जमीन पर उसकी हकीकत उतनी ही खोखली हो चुकी है।
