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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

प्रेस विज्ञप्तियां, , सूचना होती है, , खबर नहीं?

आमतौर पर दिनभर आंखों के सामने से गुजरने वाली खबरों को देखें तो ऐसा लगता है कि, आजकल प्रेस विज्ञप्तियों को खबर बनाने का चलन बढ़ता जा रहा है?

जनता सोचती है कि, उसे समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं! लेकिन सूचनाओं को खबर कहना मेरे हिसाब से ठीक नहीं है! यहां यह कहने का आशय बिल्कुल नहीं है कि, इससे खबरों के सामने प्रेस विज्ञप्तियों की महत्ता कम हो जाती है लेकिन समाचार और प्रेस विज्ञप्तियों के बीच एक महीन अंतर होता है, उसे समझना भी जरूरी है!

विज्ञापन, बैलेंसिंग के लिए भले ही विज्ञप्तियों से पेज को पाट दिया जाता है ताकि सूचनाओं की आड़ में जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाया जा सके!

सूचना और खबर का फर्क

असल सवाल यह है कि, पत्रकारिता का काम सूचना पहुँचाना भर है या सच को उजागर करना? प्रेस विज्ञप्ति में जो लिखा होता है, वह अक्सर किसी संस्था, विभाग या नेता का पक्ष होता है — लेकिन खबर तब बनती है जब उस पक्ष की जांच, पड़ताल और जमीनी सच्चाई भी सामने रखी जाए।

अगर किसी विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी कि विकास हो रहा है, तो क्या उसे बिना जांचे परखे छाप देना ही पत्रकारिता है? या फिर यह देखना भी जरूरी है कि, विकास की वह कहानी जमीन पर दिखाई भी देती है या सिर्फ कागजों में ही चमक रही है।

यही वह जगह है जहां सूचना और खबर का फर्क साफ दिखाई देता है।

पत्रकारिता की असली कसौटी

प्रेस विज्ञप्ति अक्सर तैयार माल की तरह होती है — जिसे बस छाप देना होता है। लेकिन खबर वह होती है जिसमें पत्रकार की मेहनत, उसकी पड़ताल, उसका सवाल और उसका साहस शामिल होता है।

आज मीडिया के बड़े हिस्से में यही सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है कि, क्या हम खबर बना रहे हैं या सिर्फ सूचनाएं परोस रहे हैं?

क्योंकि जब अखबारों और पोर्टलों के पन्ने सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों से भरने लगते हैं, तब धीरे-धीरे असली खबरें हाशिए पर चली जाती हैं। और जब असली खबरें हाशिए पर चली जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता का एक जरूरी हिस्सा कमजोर पड़ रहा है।

पत्रकारिता का अर्थ सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि सवाल पूछना भी है।

और शायद यही वह फर्क है जो एक साधारण सूचना और एक सच्ची खबर के बीच की असली रेखा खींचता है।

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