नेतागिरी वाली नर्मदाभक्ति!
वैसे तो नर्मदा को पतित-पावनी, जीवन दायिनी कहा जाता है, लेकिन आज वही नर्मदा अपने ही किनारों पर लुटती हुई, घुटती हुई और अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है।
और मजे की बात देखिए — जिनके हाथों में नर्मदा की रक्षा की जिम्मेदारी है, उन्हीं की नजरें सबसे पहले नर्मदा की रेत पर टिकती हैं।
आजकल एक नई किस्म की भक्ति चल पड़ी है — “नेतागिरी वाली नर्मदाभक्ति।”
इस भक्ति का तरीका भी बड़ा अनोखा है।
रास्ते से गुजरते हुए अचानक नर्मदा मैया की याद आ जाती है! गाड़ी रुकती है… नारियल चढ़ता है… दो मिनट हाथ जोड़कर फोटो खिंचती है…!
और फिर उसी झुककर किए गए “दर्शन” के बहाने नर्मदा के पेट में बची रेत का भी हिसाब लग जाता है?
दर्शन के नाम पर नजरें आस्था पर नहीं, खनन की संभावनाओं पर होती हैं।
कितनी रेत बची है… कितनी निकल सकती है… कितनी रात में निकल जाएगी… और कितनी फाइलों में “कानूनी” हो जाएगी।
भक्ति का यह नया मॉडल बड़ा कमाल का है —
एक हाथ से नारियल चढ़ाओ, दूसरे हाथ से नर्मदा का कलेजा खोदो।
और फिर मंचों से भाषण दो — “नर्मदा हमारी माँ है।”
सच तो यह है कि अगर यही भक्ति चलती रही तो एक दिन नर्मदा माँ नहीं, सिर्फ एक सूखी खदान बनकर रह जाएगी।
और तब शायद यही नेता सूखी रेत के ढेर पर खड़े होकर भी कहेंगे — “देखिए… हमने नर्मदा की कितनी सेवा की है!”
