धर्म के नाम पर तमाशा या ‘रक्षक’ का मुखौटा?
आज के डिजिटल दौर में लोकप्रिय होने का सबसे आसान रास्ता शायद यही बन गया है—धर्म के नाम पर शोर मचाओ और खुद को रक्षक घोषित कर दो। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से जुड़े पिंकी चौधरी (भूपेंद्र चौधरी) और उनके साथी दक्ष चौधरी भी कुछ इसी राह पर चलते दिखाई देते हैं।
लेकिन असली सवाल यह है—क्या यह धर्म की सेवा है, या कानून को चुनौती देकर अपनी पहचान बनाने की कोशिश?
संविधान से ऊपर कोई नहीं
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इस देश की असली ताकत है भारतीय संविधान। यही वह व्यवस्था है जो तय करती है कि न्याय कौन देगा, सजा कौन सुनाएगा और कानून का पालन कैसे होगा।
लेकिन जब कुछ लोग सड़क पर उतरकर खुद ही जज और पुलिस बनने लगें, तब लोकतंत्र की आत्मा पर चोट पड़ती है। किसी को पकड़कर मारना, भीड़ इकट्ठा करके धमकी देना या कैमरे के सामने ‘नैतिकता’ का पाठ पढ़ाना—यह न्याय नहीं, बल्कि अराजकता का प्रदर्शन है।
विवादों से पुराना रिश्ता
दक्ष चौधरी और पिंकी चौधरी का नाम पहले भी कई विवादों में सामने आ चुका है।
दक्ष चौधरी की गिरफ्तारी: हाल ही में लड़कियों से अभद्र व्यवहार और छेड़छाड़ के आरोपों में हुई गिरफ्तारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि जो खुद आरोपों से घिरे हों, वे समाज के ‘नैतिक रक्षक’ कैसे बन सकते हैं?
कानून को खुली चुनौती: पिंकी चौधरी कई बार सांप्रदायिक तनाव और हिंसक प्रदर्शनों को लेकर चर्चा में रहे हैं। गाजियाबाद में तलवारें बांटने और सार्वजनिक मंचों से धमकी देने की घटनाओं ने प्रशासन को भी सख्त रुख अपनाने पर मजबूर किया।
धर्म नहीं, दिखावा ज्यादा
अगर इतिहास और परंपरा को देखें तो हिंदू धर्म सहिष्णुता, संयम और मर्यादा की बात करता है। यह धर्म हमें कानून का सम्मान करना सिखाता है, न कि भीड़ बनाकर न्याय करने की अनुमति देता है।
लेकिन जब धर्म को कैमरे के सामने ‘कंटेंट’ बना दिया जाए, जब रील और वायरल वीडियो के लिए लोगों को डराया जाए, तब यह भक्ति नहीं रह जाती—यह शक्ति का दुरुपयोग बन जाती है।
असली सवाल समाज से
कानून से ऊपर कोई नहीं—न कोई संगठन, न कोई नेता, और न ही कोई स्वयंभू धर्मरक्षक। अगर किसी ने अपराध किया है, तो उसके लिए पुलिस है, अदालत है और न्याय व्यवस्था है।
लेकिन जब कुछ लोग खुद को संविधान से बड़ा समझने लगते हैं, तब यह सिर्फ कानून के लिए ही नहीं, बल्कि उस धर्म की छवि के लिए भी नुकसानदेह होता है जिसके नाम पर यह सब किया जाता है।
शायद समय आ गया है कि समाज इन ‘स्वयंभू रक्षकों’ से एक सीधा सवाल पूछे — धर्म की रक्षा हो रही है, या सिर्फ उसका इस्तेमाल किया जा रहा है?
