शहर में भी ऐसे अनेक घर हैं जो अब चूल्हे पर खाना पका रहे हैं! जिनके पास छत की सहूलियत है, उन्हें चूल्हा जलाने में खास दिक्कत नहीं लेकिन बिल्डिंग के अंदरूनी हिस्सों में रहने वाले रहवासियों की हालत तो और भी खराब है! धुंए की निकासी न होना या मकान मालिक द्वारा आपत्ति जैसी बातें स्थिति को और भी पेचीदा बना देती हैं।
घरेलू गैस की कीमतों में ₹60 प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी की गई! इस के बाद राजधानी में सिलेंडर की कीमत ₹853 से बढ़कर ₹913 हो गई है।
वहीं कमर्शियल LPG सिलेंडर (19 किलो) के दाम 2026 में अब तक लगातार तीन बार बढ़े! 1 मार्च को ₹28-31 की वृद्धि के बाद, 7 मार्च को फिर से ₹115 बढ़ा दिए गए! इसके पूर्व जनवरी में ₹11 और फरवरी में भी लगभग ₹50 की बढ़ोतरी हुई थी।
इस साल कमर्शियल सिलेंडर ₹200 से भी अधिक महंगा हो चुका है।
यह पूंजीवादी लोकतंत्र तो नहीं बन रहा है? जहां सामंतवादी ताकतें आज के इंसान को सिर्फ बाजार का गुलाम बना रही हैं!
10 रुपये पेट्रोल घटाने की खबर सुर्खियों में चमकती है, लेकिन रसोई की आग महंगी हो जाए तो आम आदमी की जिंदगी अंधेरे में धकेल दी जाती है।
पेट्रोल 10 रुपये सस्ता हुआ तो क्या हुआ —
• सब्ज़ी सस्ती हुई क्या?
• दूध सस्ता हुआ क्या?
• गैस सस्ती हुई क्या?
• बिजली बिल कम हुआ क्या?
असलियत यह है कि आम आदमी के खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा रसोई से जुड़ा है, न कि सिर्फ गाड़ी के पेट्रोल से।
आज हालात ये हैं कि
शहर का मध्यम वर्ग चुप है,
गरीब वर्ग परेशान है,
और निम्न मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा टूट रहा है।
किराए के मकानों में रहने वाले लोग अब गैस बचाने के लिए
सुबह एक बार खाना बनाते हैं,
रात में बचा हुआ गर्म करके खाते हैं,
और कई घरों में चाय तक सीमित हो चुकी है!
जब शहरों में लोग चूल्हे पर लौट रहे हैं, तो यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि नीति निर्माण की विफलता का संकेत है।
एक तरफ विकास की चमकदार तस्वीरें दिखाई जाती हैं, दूसरी तरफ रसोई की आग बुझती जा रही है।
सवाल उठना स्वाभाविक है —
क्या लोकतंत्र अब सिर्फ चुनाव तक सीमित रह गया है?
क्या जनता सिर्फ वोट देने तक जरूरी है?
और क्या उसके बाद वही जनता बाजार के हवाले कर दी जाती है?
जब रसोई महंगी हो जाती है, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। जब चूल्हे जलने लगते हैं, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था कहीं न कहीं असफल हो रही है।
यह सवाल आज हर घर की रसोई से उठ रहा है… और शायद जवाब अभी भी कहीं नहीं मिल रहा।
