❤️ वेलेंटाइन डे: प्यार का दिन या दिखावे का उत्सव?
कल फिर 14 फरवरी है।
फिर बाजार सजेंगे।
फिर ऑफर आएंगे।
फिर सोशल मीडिया पर लाल गुलाबों की बाढ़ आ जाएगी।
लेकिन एक सवाल है — क्या सच में हम प्यार मना रहे हैं, या सिर्फ दिखावा?
आज प्यार भी पैकेज में मिलने लगा है।
“एक गुलाब खरीदो, एक टेडी फ्री।”
“कपल ऑफर।”
“डिनर विद कैंडल लाइट।”
जैसे भावनाएं नहीं, स्कीम चल रही हो।
💭 प्यार आखिर है क्या?
क्या प्यार सिर्फ एक दिन का मोहताज है?
क्या 14 फरवरी को “आई लव यू” कह देने से जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं?
जो पति साल भर पत्नी से ठीक से बात नहीं करता,
जो बेटा मां-बाप के साथ बैठकर पांच मिनट नहीं देता,
जो प्रेमी भरोसा नहीं निभा पाता —
वह एक दिन का गुलाब देकर क्या साबित करना चाहता है?
प्यार शब्द नहीं, व्यवहार है।
प्यार पोस्ट नहीं, जिम्मेदारी है।
प्यार फोटो नहीं, भरोसा है।
🌹 विरोध भी, समर्थन भी
कुछ लोग वेलेंटाइन डे का विरोध करते हैं।
कहते हैं यह हमारी संस्कृति नहीं है।
कुछ लोग इसे खुले दिल से अपनाते हैं।
सच तो यह है कि प्यार किसी देश का मोहताज नहीं होता।
ना यह पश्चिमी है, ना पूर्वी।
ना हिंदू, ना मुस्लिम।
ना अमीर, ना गरीब।
प्यार बस प्यार होता है।
📱 सोशल मीडिया का प्यार
आजकल प्यार जितना महसूस नहीं किया जाता, उससे ज्यादा पोस्ट किया जाता है।
स्टेटस लग गया तो प्यार पक्का।
रिल बन गई तो रिश्ता मजबूत।
लेकिन रिश्ते लाइक्स से नहीं चलते,
रिश्ते विश्वास से चलते हैं।
🔍 असली सवाल
क्या हम अपने घर में, अपने समाज में, अपने व्यवहार में प्यार बढ़ा पा रहे हैं?
क्या हम अपने बच्चों को सिखा रहे हैं कि प्यार सम्मान से जुड़ा होता है?
अगर हां, तो हर दिन वेलेंटाइन डे है।
अगर नहीं, तो सिर्फ 14 फरवरी भी बेकार है।
✍️ अंत में…
प्यार मनाइए।
लेकिन दिखावे से नहीं, दिल से।
गुलाब दीजिए, लेकिन साथ में भरोसा भी।
तस्वीर डालिए, लेकिन रिश्ते भी निभाइए।
क्योंकि प्यार बाजार से नहीं खरीदा जाता,
प्यार व्यवहार से कमाया जाता है।
