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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

🔥 बिजली के खंभों पर लटकता प्रशासन का चरित्र!

नरसिंहपुर में शहर को चिंदी मार्केट बनाने की खुली छूट किसने दी?

नरसिंहपुर। जिले की सड़कों पर निकल जाइए—हर चौराहे, हर गली और हर मुख्य मार्ग पर बिजली के खंभे पोस्टर और फ्लेक्स से लदे हुए मिलेंगे। ऐसा लगता है मानो शहर नहीं, बल्कि कोई अस्थायी मेला लगा हो। सवाल सीधा है—क्या सार्वजनिक संपत्ति अब निजी प्रचार का अड्डा बन चुकी है?

⚡ बिजली के खंभे या निजी होर्डिंग स्टैंड?

बिजली के खंभों पर बंधे फ्लेक्स न सिर्फ नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि गंभीर सुरक्षा खतरा भी पैदा कर रहे हैं। बारिश और तेज हवा में ये फ्लेक्स तारों से टकराते हैं—शॉर्ट सर्किट और हादसे की आशंका बनी रहती है।

क्या जिम्मेदार विभागों को यह सब दिखाई नहीं देता? या फिर कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित है?

🏛️ नगर पालिका की चुप्पी क्यों?

सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति विज्ञापन लगाना स्पष्ट रूप से नियम विरुद्ध है। यह कार्रवाई का विषय है। फिर भी शहर में खुलेआम फ्लेक्स टंगे हैं—राजनीतिक स्वागत, जन्मदिन की बधाइयां, कोचिंग के विज्ञापन, निजी कार्यक्रमों के पोस्टर।

अगर आम नागरिक अपने घर के सामने एक छोटा बोर्ड भी लगा दे तो नोटिस थमा दिया जाता है। लेकिन जब प्रभावशाली लोग सैकड़ों फ्लेक्स टांग दें, तब नियम छुट्टी पर क्यों चले जाते हैं?

🎭 राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक लाचारी?

त्योहारों और आयोजनों के नाम पर शहर को पोस्टरबाजी से पाट दिया जाता है। हर खंभे पर एक चेहरा, हर मोड़ पर एक बधाई संदेश। यह लोकप्रियता है या सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग?

अगर यह सब बिना अनुमति हो रहा है तो जिम्मेदार कौन? और अगर अनुमति है—तो नियम किसके लिए बनाए गए हैं?

🚨 शहर की सूरत बिगाड़ने का अपराध

  • ट्रैफिक संकेत ढक जाते हैं
  • तारों पर वजन और शॉर्ट सर्किट का खतरा
  • आग और हादसों की आशंका
  • शहर की सुंदरता तार-तार

🔥 अब जवाब चाहिए!

प्रशासन को तय करना होगा—क्या शहर कानून से चलेगा या रसूख से?

अवैध फ्लेक्स लगाने वालों पर सख्त जुर्माना, सार्वजनिक रूप से नाम उजागर करना और नियमित हटाओ अभियान—यही एकमात्र रास्ता है।

शहर हमारा है—इसे चिंदी मार्केट बनने से बचाना भी हमारी ही जिम्मेदारी है।
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