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सवालों से भागेगा कौन?

कलेक्टर कार्यकाल में ‘उत्कृष्ट’ का ढोल, जमीनी हकीकत में गोल?

नरसिंहपुर में इन दिनों एक नया ट्रेंड चल रहा है — समस्या से पहले समाधान की घोषणा, और समाधान से पहले निस्तारण। कागज़ों में विकास दौड़ रहा है, मगर ज़मीन पर लोग अभी भी ठोकर खा रहे हैं।

इन दिनों ऐसा लगता है जैसे प्रशासन ने “आत्मसम्मान सप्ताह” मना रखा हो।प्रेस नोट जारी होते हैं।मीटिंग होती है।निर्देश दिए जाते हैं।

तस्वीरें खिंचती हैं।

और फिर…

वही ढाक के तीन पात।

अगर काम कागज़ पर होता तो नरसिंहपुर शायद प्रदेश का नंबर वन जिला घोषित हो चुका होता।

पर अफसोस… लोग अभी भी सड़कों पर चलते हैं, फाइलों पर नहीं।

प्रशासन कहता है — “सब नियंत्रण में है।” जनता पूछ रही है — “तो फिर हालात बेकाबू क्यों दिख रहे हैं?”

🧹 सफाई अभियान या फोटो अभियान?

शहर की गलियों में कूड़े के ढेर लोकतंत्र की तरह स्थायी हो चुके हैं। नालियाँ जाम हैं, बदबू आम है, लेकिन रिपोर्ट में “सघन अभियान सफल” दर्ज है। लगता है झाड़ू ज़मीन से ज्यादा कैमरे के लिए चल रही है।

🚬 नशे पर सख्ती या सिर्फ बयानबाज़ी?

युवाओं में नशे की चर्चा खुलकर हो रही है। नाम लिए जा रहे हैं, जगहें चिन्हित हैं। मगर कार्रवाई की गूंज उतनी तेज़ क्यों नहीं जितनी प्रेस नोट की भाषा?

📞 सीएम हेल्पलाइन: शिकायत करो, फिर भूल जाओ?

सीएम हेल्पलाइन कभी उम्मीद की किरण मानी जाती थी।अब कई लोगों के लिए यह “डिजिटल शांति पाठ” बन चुकी है।

शिकायत कीजिए।

टोकन नंबर पाइए।

फिर इंतजार कीजिए।

और अचानक एक दिन देखिए —

आपकी शिकायत “निस्तारित” हो चुकी है।

कैसे?

किससे पूछकर?

किस जांच के आधार पर?

शिकायतकर्ता हैरान।

सिस्टम संतुष्ट।

और आंकड़े चमकदार।

अगर समस्या हल करने से ज्यादा जरूरी उसे “बंद” करना हो जाए,

तो समझ लीजिए खेल आंकड़ों का है, समाधान का नहीं।

समस्या जस की तस, लेकिन सिस्टम संतुष्ट।

अगर निस्तारण का मतलब सिर्फ सिस्टम में टिक लगाना रह जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?

💸 ग्राम पंचायतों में गड़बड़ियां: कार्रवाई शून्य?

गांवों में लोग सवाल पूछ रहे हैं। राशि का हिसाब मांग रहे हैं। मगर उदाहरणात्मक सख्त कार्रवाई क्यों नहीं दिखती? क्या फाइलें भी “प्रक्रिया में” स्थायी रूप से अटक गई हैं?

🎭 जन सुनवाई: समाधान मंच या प्रशासनिक अभिनय?

हर हफ्ते जन सुनवाई होती है। लोग आवेदन लेकर आते हैं। अधिकारी सुनते हैं, सिर हिलाते हैं, आश्वासन देते हैं।

मगर जब सुनवाई “सुनने” तक सीमित रह जाए, तो क्या उसे न्याय कहा जा सकता है?

अगर आवेदन सिर्फ फाइलों की संख्या बढ़ाने के लिए हैं, अगर शिकायतकर्ता को फिर वही चक्कर लगाने पड़ें, अगर मंच सिर्फ औपचारिकता हो — तो जनता इसे “जन सुनवाई” नहीं, “जन तमाशा” क्यों न कहे?

🔥 सवाल सीधे हैं

क्या प्रशासन छवि प्रबंधन में ज्यादा व्यस्त है? क्या आंकड़े जमीनी सच्चाई पर भारी पड़ रहे हैं? क्या जन सुनवाई भरोसे का मंच है या व्यवस्था का ढोंग?

नरसिंहपुर अब ताली नहीं, जवाब चाहता है।

क्योंकि जनता की आवाज़ को “फोर्स क्लोज” नहीं किया जा सकता। और अगर सवाल बढ़ते गए, तो जवाब देना ही पड़ेगा।

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