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 | विशेष आध्यात्मिक श्रृंखला |

द्वारकामाई की धूनी

जब साईं की यात्रा परिवार के साथ शुरू हुई


नरसिंहपुर से कोपरगांव जाने वाली ट्रेन में बैठते समय यह तय नहीं था कि शिरडी जा रहा हूँ या अपने भीतर कहीं उतर रहा हूँ।

इस बार मैं अकेला नहीं था। मेरे साथ मेरी पत्नी थी और मेरी पंद्रह वर्ष की बेटी — गौरी।

गौरी के हाथ में मोबाइल नहीं था। उसकी आँखों में सवाल थे।

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से खिसकी। खिड़की से शहर पीछे छूटने लगा। जैसे कोई परिचित जीवन कुछ देर के लिए विदा ले रहा हो।

गौरी ने अचानक पूछा — “पापा, साईं भगवान थे या इंसान?”

मैं चुप रहा।

शायद इस यात्रा का उत्तर मुझे नहीं देना था।

शायद यह सवाल साईं के लिए था।

मेरी पत्नी खिड़की से बाहर देख रही थी। वह यात्रा में नहीं, यात्रा को संभाल रही थी।

डिब्बे में तरह-तरह के चेहरे थे। कोई सो रहा था, कोई माला फेर रहा था, कोई अपने ही ख्यालों में खोया हुआ।

मुझे लगा — अगर साईं आज होते, तो शायद इसी डिब्बे में होते। बिना पहचान, बिना चमत्कार।

गौरी स्टेशन के नाम पढ़ रही थी। हर नया नाम उसे किसी नई कहानी जैसा लगता।

बीच-बीच में वह पूछती — “अब कितना दूर है?”

और मुझे लगता — यह दूरी कोपरगांव की नहीं, समझ की है।

यह यात्रा गौरी की है। हम तो बस उसके साथ चल रहे हैं।

कोपरगांव अभी दूर था। शिरडी भी।

लेकिन धूनी मन में जल चुकी थी।


अगले भाग में पढ़िए — “कोपरगांव से शिरडी : जब रास्ता छोटा और प्रश्न बड़े हो गए”

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