ग्राम पंचायत में आर्थिक अनियमितता?
क्या जनपद अधिकारियों के संरक्षण में पल रहा है भ्रष्टाचार?
जनपद करेली | जिला नरसिंहपुर
जब पंचायत में गड़बड़ी हो और अधिकारी खामोश रहें, तो सवाल सिर्फ़ पंचायत पर नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र पर उठता है।
ग्राम पंचायत रातिकरार कला में भूसा खरीदी का मामला अब सिर्फ़ संदेह नहीं, सीधे-सीधे जवाब मांग रहा है।
दस्तावेज़ बताते हैं कि भरत राजपूत के नाम पर 10 महीनों में करीब 90 ट्राली भूसा खरीदा गया — दर ₹5000 प्रति ट्राली!
काग़ज़ों में गौशाला भरी हुई है, लेकिन ज़मीन पर गौवंश गिनती में क्यों कम पड़ जाता है?
ग्रामीणों से बातचीत में जो तस्वीर सामने आई, वह सरकारी रजिस्टरों की कहानी से मेल नहीं खाती।
ग्रामीण साफ़ कहते हैं — गौशाला में उतने पशु ही नहीं हैं, जितने पशुओं के लिए इतना भूसा खरीदा गया!
अब सवाल पंचायत से आगे निकल चुके हैं—
- क्या जनपद पंचायत के अधिकारी आंख मूंदकर बिल पास करते रहे?
- क्या किसी भी स्तर पर भौतिक सत्यापन किया गया?
- अगर नहीं, तो जिम्मेदार कौन — सचिव या जनपद अधिकारी?
- और अगर किया गया, तो रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं?
क्या जनपद कार्यालय भ्रष्टाचारियों के लिए सुरक्षा कवच बन चुका है?
सबसे असहज सवाल—
- क्या जनपद स्तर पर जानबूझकर आंखें मूंदी गईं?
- क्या अधिकारी किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत दबाव में हैं?
- या फिर सवाल यह है कि लिफ़ाफ़ों का बोझ इतना भारी है कि काग़ज़ों की सच्चाई दिखनी ही बंद हो गई?
- अगर सब कुछ साफ़ है, तो जांच से डर क्यों?
जब अधिकारी चुप रहते हैं, तो शक अपने आप बोलने लगता है।
यह रिपोर्ट किसी पर फैसला नहीं सुनाती, लेकिन यह जरूर पूछती है कि —
जनता के पैसे की रखवाली करने वाले अधिकारी आख़िर किसकी सेवा कर रहे हैं?
अगर प्रशासन अब भी मौन रहा, तो यह चुप्पी खुद एक बयान बन जाएगी।
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