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बिना संरक्षण के इतना बेख़ौफ़ होना मुमकिन नहीं।
सत्य और समाज के बीच की कड़ी

बेख़ौफ़ खनन माफिया: जब उजाला भी डर जाए

संपादकीय | यह सवाल आपको असहज करेगा

यह अपराध अंधेरे में नहीं होता।

इसे रात की ज़रूरत नहीं पड़ती।

इसे दिन के उजाले का भरोसा है।

सूरज निकलता है। दफ्तर खुलते हैं। फाइलें मेज़ पर रखी जाती हैं।

और उसी समय नदी से रेत निकाली जाती है— बेधड़क, बेहिचक।

जब अपराध छिपता नहीं, तो डर किसे लगता है?

गांव जानता है। किसान जानता है। यहां तक कि बच्चे भी जानते हैं—

कौन सा ट्रैक्टर किसका है और कौन सा डंपर किसके इशारे पर चलता है।

अब सवाल प्रशासन से है।

चिचली जनपद अध्यक्ष श्रीमती राधा अहिरवार कलेक्टर को लिखित शिकायत करती हैं।


उसके बाद भी कार्रवाई शून्य क्यों?

क्या एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि की आवाज़ भी इस सिस्टम तक पहुंचने से पहले दबा दी जाती है?

अगर यह शिकायत झूठी है— तो सार्वजनिक जांच क्यों नहीं?

और अगर शिकायत सच है— तो कार्रवाई कहां अटकी है?

यही वह जगह है जहां से सवाल खतरनाक हो जाता है।

क्या खनन माफिया को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है?

क्योंकि बिना संरक्षण के इतना बेख़ौफ़ होना मुमकिन नहीं।

बिना सहमति के इतना लंबा मौन संभव नहीं।

और बिना हिस्सेदारी के इतनी गहरी चुप्पी नहीं आती।

नदी सिर्फ पानी नहीं है।

वह गांव की सांस है। वह किसान की उम्मीद है। वह आने वाले बच्चों का हक़ है।

जब नदी लूटी जाती है, तो सिर्फ रेत नहीं जाती—

भविष्य चला जाता है।

सबसे डरावनी बात यह नहीं कि अपराध हो रहा है। सबसे डरावनी बात यह है कि किसी को डर नहीं लग रहा।

न माफिया को।

न अफसरों को।

और शायद— अब सिस्टम को भी नहीं।

सवाल अभी ज़िंदा हैं।

जवाब कब आएंगे?

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