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STRINGER24 NEWS | विशेष रिपोर्ट

खदान स्वीकृत नहीं… फिर खनन जारी क्यों?
शिकायत कलेक्टर तक पहुँची… फिर खामोशी क्यों?

नरसिंहपुर ज़िले में आज सवाल एक नहीं हैं। सवालों की कतार है। और हर सवाल, पिछले सवाल से ज़्यादा असहज है।

काग़ज़ कहते हैं— खदान स्वीकृत नहीं है। कानून कहता है— खनन अवैध है।

फिर भी धरती खोदी जा रही है। रेत निकाली जा रही है। डंपर सड़कों पर दौड़ रहे हैं।

तो सवाल यह नहीं कि अवैध खनन हो रहा है या नहीं।
सवाल यह है कि यह सब किसकी सहमति से हो रहा है?

अब इस कहानी में एक और परत जुड़ती है— सालीचौक वार्ड के पार्षद संतोष अग्रवाल का नाम।

ग्रामीणों ने डर के मारे चुप्पी नहीं साधी। उन्होंने शिकायत की। लिखित शिकायत। सीधे जिला कलेक्टर के समक्ष।

यानी अब यह बात गली-मोहल्ले की नहीं रही। यह प्रशासनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है।

फिर भी— कोई कार्रवाई नहीं। कोई नोटिस नहीं। कोई स्पष्ट जवाब नहीं।

आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है
कि खनन माफिया पर लगाम लगाने की बजाय
प्रशासन ने खामोशी की चादर ओढ़ ली?

क्या मजबूरी यह है कि आरोप किसी आम आदमी पर नहीं, एक जनप्रतिनिधि पर है?

क्या कानून सबके लिए बराबर नहीं होता? या फिर कानून भी पहचान देखकर लागू होता है?

अगर यही काम किसी आदिवासी मज़दूर ने किया होता, तो अब तक थाना, तहसील और ट्रेज़री— तीनों सक्रिय हो चुके होते।

लेकिन यहाँ मामला “बड़े नाम” का है। तो कार्रवाई नहीं— संयम दिखाया जा रहा है।

प्रशासन कभी-कभार छोटी मछलियाँ पकड़ लेता है। एक ट्रैक्टर ज़ब्त। एक मज़दूर हिरासत में।

फिर प्रेस नोट जारी होता है— “अवैध खनन पर सख़्त कार्रवाई।”

लेकिन ज़मीन पर खनन चलता रहता है।

यह कार्रवाई नहीं, औपचारिकता है।
और औपचारिकता हमेशा माफिया के काम आती है।

कभी यही ज़िला नर्मदा भक्ति के नारों से गूंजता था। आज वही नर्मदा खामोशी से छलनी की जा रही है।

नर्मदा भक्त कहाँ हैं? या भक्ति अब मंच, पोस्टर और भाषण तक सिमट चुकी है?

और स्थानीय मीडिया— उसकी चुप्पी सबसे ज़्यादा बोलती है।

यह चुप्पी डर की है? सुविधा की है? या उस समझौते की जिसमें सवाल पूछना घाटे का सौदा होता है?

आज नरसिंहपुर में लड़ाई सिर्फ़ अवैध खनन की नहीं है। यह लड़ाई है—

  • सवाल बनाम खामोशी की
  • कानून बनाम पहचान की
  • जनता बनाम उस सिस्टम की, जो शिकायत मिलने के बाद भी आँखें मूंद लेता है
जब खदान स्वीकृत नहीं,
जब शिकायत कलेक्टर तक है,
फिर भी खनन जारी है—

तो यह प्रशासन की नाकामी नहीं,
प्रशासन की रज़ामंदी है।

और यह रज़ामंदी हर दिन नर्मदा की छाती पर एक और घाव छोड़ जाती है।

© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
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