नर्मदा भक्त चुप क्यों हैं?
क्या पॉलीथिन उठाने से नदी बच जाती है?
नर्मदा को मां कहा जाता है। लेकिन क्या मां की पीठ पर जेसीबी चले और बेटा आरती करता रहे — तो उसे भक्ति कहेंगे या सुविधा?
क्या नर्मदा की रक्षा का मतलब सिर्फ दीप बहाना है? या फिर उस मशीन को रोकना भी है जो रोज उसके शरीर से रेत नोच रही है?
कुछ सीधे सवाल
जब रात में ट्रैक्टर नदी में उतरते हैं, तो क्या वे नर्मदा को दिखाई नहीं देते या फिर जानबूझकर अनदेखा किया जाता है?
क्या नर्मदा सिर्फ सुबह की आरती तक सीमित है? क्या रात की खुदाई उसकी पवित्रता का हिस्सा नहीं?
क्या भक्ति इतनी कमजोर है कि वह माफिया से सवाल नहीं पूछ सकती?
पॉलीथिन बनाम पोकलेन
पॉलीथिन उठाने के अभियान होते हैं। फोटो खिंचती है। फेसबुक पर पोस्ट याद आती है।
लेकिन पोकलेन? ट्रॉली? खनन माफिया?
इन पर पोस्ट क्यों नहीं बनती? इन पर मौन क्यों छा जाता है?
क्या पॉलीथिन गरीब का अपराध है और रेत अमीरों की मजबूरी?
नर्मदा भक्तों की चयनात्मक आवाज़
नर्मदा भक्त बोलते हैं —
- जब कोई घाट गंदा करे
- जब कोई कपड़े धोए
- जब कोई प्लास्टिक फेंके
लेकिन वे चुप हो जाते हैं —
- जब नदी का रास्ता बदला जाता है
- जब जलस्तर गिरता है
- जब मछलियां मरती हैं
यह कैसी भक्ति है जिसमें सवाल चुनकर पूछे जाते हैं?
प्रशासन से सवाल
अगर अवैध उत्खनन हो रहा है, तो क्या प्रशासन को जानकारी नहीं?
और अगर जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या नर्मदा इतनी छोटी है कि उसका अपराध फाइलों में दब जाए?
अंत में एक सवाल
क्या हम नर्मदा को सच में बचाना चाहते हैं या सिर्फ यह साबित करना चाहते हैं कि हमने कुछ किया?
क्योंकि —
नदियाँ पोस्ट से नहीं बचतीं। नदियाँ साहस से बचती हैं।
और साहस वही दिखाता है जो मां को मां समझता है, सजावट नहीं।
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
