https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 


🇮🇳 गणतंत्र दिवस विशेष

STRINGER24 NEWS

गणतंत्र: जब हम खुद से सवाल करना भूल गए?

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा — क्या आज भी हम इस पंक्ति के अर्थ को जी रहे हैं?

सुबह का वक्त है। गांव के चौराहे पर तिरंगा फहराया जा रहा है। बच्चे कतार में खड़े हैं, राष्ट्रगान की पंक्तियां याद करने की कोशिश करते हुए।

कार्यक्रम समाप्त होगा, चाय बंटेगी, और फिर सब अपने-अपने काम में लग जाएंगे।

हर साल यही होता है। और शायद इसी साधारण दृश्य में गणतंत्र का सबसे बड़ा सवाल छुपा है।

गणतंत्र की शुरुआत, जनता से भरोसा

इस वर्ष देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ, तब यह तय किया गया था कि यह देश किसी व्यक्ति, किसी जाति या किसी धर्म से नहीं, बल्कि संविधान और विवेक से चलेगा।

यह केवल शासन प्रणाली नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक अनुशासन था — जिसमें हर नागरिक की जिम्मेदारी तय की गई थी।

बदलता भारत, ठहरता समाज

बीते दशकों में भारत बदला है। कच्ची सड़कों की जगह पक्की सड़कें आईं, गांव तक इंटरनेट पहुंचा, और योजनाओं के नाम आम बोलचाल का हिस्सा बने।

लेकिन सवाल धीरे-धीरे उभरता है — क्या समाज भी उतना ही बदला?

आज भी पहचान नाम से पहले पूछी जाती है। आज भी राय डर के साथ दी जाती है। और आज भी कई असहज सवाल चुपचाप टाल दिए जाते हैं।

धर्म, आस्था और राजनीति

कभी धर्म गांव को जोड़ने का माध्यम था। आज वह बहस और विभाजन का कारण बनता जा रहा है।

आस्था निजी थी, अब सार्वजनिक प्रदर्शन हो गई है। और राजनीति ने इस आस्था को धीरे-धीरे रणनीति में बदल दिया है।

जब मुद्दों की जगह पहचान ले ले, तो गणतंत्र कमजोर पड़ने लगता है।

भीड़ और जिम्मेदारी

आज फैसले सोच-समझकर कम, बहाव में ज्यादा लिए जा रहे हैं।

एक संदेश, एक वीडियो, और राय तय हो जाती है। भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, जिम्मेदारी लेना मुश्किल।

लेकिन गणतंत्र भीड़ से नहीं, जिम्मेदार नागरिकों से चलता है।

महिला, युवा और किसान

महिला की सुरक्षा आज भी भरोसे का विषय नहीं बन पाई।

युवा शिक्षित है, लेकिन दिशा को लेकर असमंजस में है।

किसान उत्पादन करता है, पर निर्णय प्रक्रिया से दूर है।

ये आरोप नहीं हैं, ये संकेत हैं — जिन पर रुककर सोचना जरूरी है।

गणतंत्र दिवस : जश्न या जिम्मेदारी?

गणतंत्र दिवस अब अक्सर एक औपचारिकता बनता जा रहा है।

संविधान की प्रस्तावना पढ़ी जाती है, लेकिन उस पर बातचीत नहीं होती।

“हम भारत के लोग” कहते तो हैं, लेकिन हम में कौन है और कौन नहीं — इस पर चुप्पी रहती है।

“हम भारत के लोग…”

संविधान की यह पहली पंक्ति आज भी सबसे बड़ा सवाल है।

क्या हम आज भी इंसान को इंसान की तरह देखने को तैयार हैं?

गणतंत्र सरकार से नहीं, नागरिक के आचरण से चलता है।

अंत में

26 जनवरी केवल उत्सव का दिन नहीं है।

यह रुककर सोचने का दिन है — कि हमने क्या सवाल पूछना छोड़ दिया।

अगर हम चुप रहना ही सामान्य मान लेंगे, तो गणतंत्र सिर्फ किताबों में रह जाएगा।अगर हम आज भी धर्म, जाति और नफरत के सहारे अपनी राजनीति और पहचान तय करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी —

क्या यही था तुम्हारा गणराज्य?

इस गणतंत्र दिवस पर सबसे जरूरी सवाल यही है —

क्या हम सच में गणतंत्र को जी रहे हैं?

© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी.
أحدث أقدم

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर