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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

गणतंत्र दिवस के जश्न के बीच सालीचौका में उठा किसान आक्रोश?

नरसिंहपुर में जहां तिरंगा लहरा रहा था, वहीं सालीचौका में ट्रैक्टरों की गूंज ने सरकार से सवाल पूछे

जब पूरा नरसिंहपुर जिला गणतंत्र दिवस की खुशियों में डूबा हुआ था, उसी वक्त सालीचौका में एक अलग ही तस्वीर नजर आई। यहां संयुक्त मोर्चा के बैनर तले ट्रैक्टर मार्च निकालकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया गया।

यह विरोध भले ही मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों में न आया हो, लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात में इसके मायने बेहद गहरे हैं।

कौन कर रहा था विरोध?

सालीचौका में यह प्रदर्शन माकपा, कांग्रेस और किसान सभा के संयुक्त नेतृत्व में किया गया।

इसमें प्रमुख रूप से माकपा जिला सचिव कामरेड जगदीश पटेल, कांग्रेस मंडल अध्यक्ष पवन शुक्ला, किसान सभा तहसील महासचिव देवेंद्र वर्मा, लीलाधर लोधी, करण सहित माकपा राज्य सचिवमंडल सदस्य एवं किसान सभा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बादल सरोज और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव मनीष राय ‘छोटू भैया’ मुख्य रूप से मौजूद रहे।

विरोध की असली वजह क्या है?

माकपा और किसान नेताओं का साफ आरोप है कि मोदी सरकार और मध्यप्रदेश की मोहन सरकार किसान और मजदूर विरोधी नीतियां चला रही हैं और किसानों से किए गए वायदों से लगातार मुकर रही हैं।

खाद संकट बना सबसे बड़ा मुद्दा

दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के दौरान खाद की किल्लत किसानों के लिए सबसे गंभीर समस्या बनकर सामने आई।

हजारों किसान फोन और केंद्रों पर घंटों लाइन में लगे रहे, लेकिन प्रतिदिन केवल लगभग 100 किसानों को ही खाद मिलने के कारण अधिकांश किसान खाली हाथ लौटने को मजबूर हुए।

खेत तैयार, फसल सामने — लेकिन खाद के बिना किसान लाचार!

शुगर मिल भुगतान और कम दरों का दर्द

शुगर मिलों में लंबित भुगतान (Payment Arrears) और अन्य मिलों की तुलना में कम दर मिलने जैसे मुद्दे भी इस आंदोलन के केंद्र में रहे।

नेताओं ने याद दिलाया कि वर्ष 2028 में आयोजित ‘कृषि उद्योग समागम’ में, जहां उपराष्ट्रपति और मुख्यमंत्री तक मौजूद थे, वहीं किसानों ने अपनी समस्याएं सीधे सरकार के सामने रखी थीं — लेकिन आज तक ठोस समाधान नहीं मिला।

क्यों खास है यह आंदोलन?

किसानों से जुड़े मुद्दों पर माकपा और किसान नेताओं की मुखरता कोई नई बात नहीं है।

लेकिन गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व के दिन ट्रैक्टर मार्च के जरिए उठी यह आवाज यह सवाल जरूर खड़ा करती है —

क्या लोकतंत्र केवल उत्सव मनाने का नाम है, या फिर जनता की पीड़ा सुनने की भी जिम्मेदारी है?
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