“मीडिया मेरी जेब में है!”
सरपंच पति की दबंगई के साए में फर्जी बिलों का खेल?
ग्राम पंचायत सिवनी बंधा, जनपद गोटेगांव
ग्राम पंचायत सिवनी बंधा में काग़ज़ों में भले ही सरपंच का नाम राधा बाई दर्ज हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। गांव में खुलेआम कहा जा रहा है कि सरपंच सिर्फ फाइलों में हैं, जबकि पंचायत की कमान सरपंच पति और “गांव के बड़े आदमी” के हाथों में है।
“हम लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते, पंचायत तो गांव के बड़े लोग चला रहे हैं!”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ध्यान ही नहीं दिया जाता, तो दो-दो फर्जी बिल आखिर कैसे लग जाते हैं?
कुर्सी के खेल में सचिव की चांदी?
पंचायत में सत्ता की इस अंदरूनी लड़ाई का सबसे ज़्यादा फायदा अगर किसी को मिला, तो वह हैं सचिव गणपत। जिस तरह से पंचायत में बिल लगाए गए, चहेतों को भुगतान किया गया और रिकॉर्ड तैयार हुए, वह साफ इशारा करता है कि पूरा खेल सोची-समझी रणनीति के तहत खेला गया।
• धुंधले बिल
• गलत जानकारियां
• काग़ज़ों में भुगतान, ज़मीन पर सवाल
नतीजा यह कि जनता भी गुमराह और अधिकारी भी!
“मीडिया मैनेजमेंट” या सच दबाने की साजिश?
नाम न जाहिर करने की शर्त पर ग्रामीणों ने बड़ा आरोप लगाया है कि पंचायत में चल रही अनियमितताओं को दबाने के लिए मीडिया की खास आवभगत की जाती है! विज्ञापन और सम्मान राशि के नाम पर मोटा खर्च दिखाया जा रहा है, ताकि सवाल उठाने वाली आवाज़ें पहले ही दब जाएं!
ग्रामीणों का सीधा सवाल है — अगर सब कुछ साफ़ है, तो फिर पंचायत नीलेश खरिया, राममूर्ति, योगेश छीरा, योगेश स्टेशनरी, सूर्या स्टेशनरी, योगेश सिलावट के नाम पर हुए भुगतानों की खुली जांच से क्यों भाग रही है?
मनरेगा में भी ‘चहेतों’ का बोलबाला?
मामला सिर्फ बिलों तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि मनरेगा मजदूरी में भी खुला खेल चल रहा है —
• चहेते मजदूर
• चुनिंदा भुगतान
• ताकि कमीशन का खेल चलता रहे
अब सवाल पंचायत से नहीं, सिस्टम से है
यह मामला सिर्फ सिवनी बंधा पंचायत का नहीं रहा। यह सवाल है — महिला सरपंच की वास्तविक भूमिका, अधिकारियों की निगरानी और उस सिस्टम का, जहां कोई सीना ठोककर कह सके —
“मीडिया मेरी जेब में है!”
अब देखना यह है कि जनपद और जिला प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराता है, या फिर यह आग भी काग़ज़ों के ढेर में दबा दी जाएगी?
