मां भी कहते हैं और छल भी करते हैं?
नर्मदा— यह सिर्फ एक नदी नहीं है। यह इस अंचल की सांस है, किसानों की उम्मीद है, पशु-पक्षियों का आश्रय है और लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी का आधार है। नर्मदा के बहाव के साथ ही खेतों में हरियाली आती है, गांवों में जीवन चलता है और शहरों की प्यास बुझती है।
नर्मदा के तट पर बसे गांवों में आज भी लोग सुबह उठकर सबसे पहले मां नर्मदा को प्रणाम करते हैं। बच्चों को सिखाया जाता है कि यह मां है, इसका अपमान मत करना। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पूजा-पाठ के बाद दिन-रात उसी मां की कोख से रेत निकालने का खेल बेरोकटोक चल रहा है।
श्रद्धा मंचों पर है, और शोषण घाटों पर — यही विरोधाभास आज नर्मदा की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है।
नर्मदा पर टिका पूरा तंत्र
सिंचाई हो या पेयजल, बिजली उत्पादन हो या छोटे-बड़े उद्योग — इस पूरे क्षेत्र का जीवन नर्मदा पर ही निर्भर है। जब आसपास की नदियां और नाले गर्मियों में सूख जाते हैं, तब भी नर्मदा लोगों की प्यास बुझाती है।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। जिन घाटों पर कभी कमर तक पानी रहता था, वहां आज रेत के टीले नजर आने लगे हैं।
रेत खनन: विकास की आड़ में विनाश
नर्मदा के तटीय इलाकों में अवैध रेत खनन अब कोई छिपी हुई बात नहीं रही। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार रात के अंधेरे में पोकलेन मशीनें नदी में उतरती हैं और सुबह तक दर्जनों ट्रॉली रेत घाटों से बाहर निकल जाती हैं।
- नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो रहा है
- किनारों का कटाव तेजी से बढ़ रहा है
- खेती की जमीन नदी में समा रही है
- मछलियां और जलीय जीव लगातार गायब हो रहे हैं
ग्रामीण बताते हैं कि पहले जहां बच्चे नहाते थे, वहां अब अचानक गहरे गड्ढे बन गए हैं। कई जगह हादसे भी हो चुके हैं, लेकिन रेत माफिया पर इसका कोई असर नहीं दिखता।
लोकल आवाज़ें क्या कहती हैं?
तटवर्ती गांवों के बुजुर्ग कहते हैं — “हमने नर्मदा को कभी इतना कमजोर नहीं देखा। पहले बाढ़ आती थी तो उपजाऊ मिट्टी छोड़ जाती थी, अब सिर्फ गड्ढे और डर बचा है।”
किसानों का कहना है कि जलस्तर नीचे जाने से कुएं और बोर समय से पहले सूख जाते हैं। सिंचाई का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन जिम्मेदार सुनने को तैयार नहीं।
विरोध करो तो कहा जाता है — रेत से ही विकास होगा, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि यह विकास किसका है?
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
नियमों में खनन की सीमा, समय और मशीनों पर रोक तय है, इसके बावजूद जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है। कार्रवाई होती भी है तो अक्सर कागजों तक सीमित रहती है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना संरक्षण के इतना बड़ा अवैध खेल संभव नहीं। छोटी-मोटी कार्रवाई कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है, जबकि नर्मदा दिन-प्रतिदिन खोखली होती जा रही है।
मां कहने का मतलब जिम्मेदारी
नर्मदा को मां कहना सिर्फ एक धार्मिक भावना नहीं, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियां नर्मदा को सिर्फ नारों और तस्वीरों में ही देखेंगी।
अब भी समय है कि अवैध रेत खनन पर सख्ती हो, स्थानीय समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और प्रशासन ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाए। वरना इतिहास यही पूछेगा — मां भी कहते रहे और उसे लूटते भी रहे?
