गांजे से खोखली होती युवा पीढ़ी!
साठ रुपये की पुड़िया और नरसिंहपुर का खामोश सिस्टम
नरसिंहपुर की गलियों में अगर आज आप थोड़ा ठहर कर देखें, तो आपको राजनीति के पोस्टर कम और नशे में डूबी आंखें ज़्यादा दिखेंगी। बस स्टैंड हो, कॉलेज रोड हो या फिर कस्बाई मोहल्ले — साठ रुपये की गांजे की पुड़िया यहां भविष्य से सस्ती हो चुकी है।
सवाल सीधा है — जब पुड़िया खुलेआम बिक रही है, तो आंखें बंद किसकी हैं?
यह वही नरसिंहपुर है, जहां मां-बाप बच्चों को पढ़ाने के लिए कर्ज तक ले लेते हैं। और वही बच्चे, स्कूल की घंटी और ट्यूशन की कॉपी छोड़कर नशे की आदत सीख रहे हैं। कोई कॉलेज नहीं पहुंच पा रहा, कोई नौकरी के इंटरव्यू से पहले ही हार मान चुका है।
गांजा यहां कोई छुपा हुआ राज़ नहीं है। सबको पता है — किस चौराहे पर, किस समय, किस भरोसे पुड़िया मिल जाती है। लेकिन सवाल यह है कि पुलिस को यह सब क्यों नहीं दिखता? या दिखता है, लेकिन दिखाया नहीं जाता?
साठ रुपये की कीमत
साठ रुपये सुनने में छोटी रकम है। लेकिन यही साठ रुपये एक घर की शांति, एक मां की नींद, और एक पिता की उम्मीद चुपचाप निगल जाते हैं। नशे में डूबा बेटा न नौकरी के लायक बचता है, न परिवार के।
विकास के दावों के बीच नरसिंहपुर का युवा नशे की गलियों में भटक रहा है।
चुप्पी भी अपराध होती है
प्रशासन अगर कहे कि उसे जानकारी नहीं, तो यह नाकामी है। और अगर जानकारी के बाद भी कार्रवाई नहीं, तो यह सहमति मानी जाएगी। नशे के खिलाफ पोस्टर लगाने से नशा नहीं रुकता, कार्रवाई से रुकता है।
सवाल सरकार से भी है, समाज से भी और हम सब से भी — क्या हम तब जागेंगे जब यह नशा हमारे घर के दरवाज़े तक पहुंच जाएगा?
क्योंकि याद रखिए — साठ रुपये की पुड़िया केवल गांजा नहीं बेच रही, यह एक पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे खत्म कर रही है।
