समाज में खत्म हो चुकी नैतिकता?
प्यार के नाम पर पैदा होकर कूड़े में फेंके जा रहे बच्चे
विशेष रिपोर्ट | विक्रम सिंह राजपूत
यह कोई भावनात्मक लेख नहीं है। यह एक सीधा आरोप है — हमारे समाज पर।
जिस देश में गर्भ में बच्चा “भगवान का वरदान” कहलाता है, उसी देश में नवजातों का अस्पतालों, सड़कों और कूड़ेदानों में मिलना अब सामान्य होता जा रहा है।
और सबसे खतरनाक बात — हम इसे सामान्य मानने लगे हैं।
ये कोई धारणा नहीं, सरकारी सच्चाई है
अगर कोई इसे नैतिक बहस समझ रहा है, तो पहले आंकड़े देख ले।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, सरकारी गोद लेने के पोर्टल CARINGS पर पंजीकृत अनाथ, छोड़े गए और सरेंडर किए गए बच्चों की संख्या 2020–21 में 4,521 थी, जो 2022–23 में बढ़कर 5,663 हो गई।
यानी हर साल और ज़्यादा बच्चे अपने ही जन्म देने वालों द्वारा ठुकराए जा रहे हैं।
और ये सिर्फ़ वही बच्चे हैं जो सिस्टम की गिनती में आ पाए।
जो आंकड़ों में नहीं, वो सड़कों पर हैं
अंतरराष्ट्रीय संस्था UNICEF का अनुमान और भी डरावना है।
भारत में लगभग 3 करोड़ (31 मिलियन) अनाथ और परित्यक्त बच्चे हैं।
तीन करोड़!
यह किसी प्राकृतिक आपदा का आंकड़ा नहीं है। यह मानव निर्मित संवेदनहीनता का परिणाम है!
हर बार औरत को कटघरे में क्यों?
हर बार वही लाइन —
“औरत मां कहलाने के लायक नहीं रही।”
सवाल यह है —
- क्या बच्चा बिना पुरुष के पैदा हुआ?
- क्या रिश्ते की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ औरत की थी?
- और जब बच्चा छोड़ा गया, तब समाज कहां था?
सच्चाई यह है —
यह अपराध अकेली औरत का नहीं, पुरुष की कायरता, परिवार की चुप्पी और समाज की दोहरी नैतिकता का नतीजा है।
ये बच्चे लावारिस नहीं, सबूत हैं
हर छोड़ा गया बच्चा एक जिंदा सबूत है —
कि हमारा समाज रिश्ते बनाना जानता है, निभाना नहीं।
अगर प्यार में गलती हो सकती है, तो उसकी सज़ा किसी मासूम को मौत या बेसहारा ज़िंदगी देकर क्यों?
क़ानून भी सवालों के घेरे में
आज भी ऐसे मामलों में —
- पुरुष आसानी से गायब हो जाता है
- औरत सामाजिक अपमान झेलती है
- और बच्चा सिस्टम की दया पर छोड़ दिया जाता है
यह न्याय नहीं, संस्थागत विफलता है।
अब सवाल से भागने का समय नहीं
या तो समाज ज़िम्मेदारी लेना सीखे, या फिर लावारिस बच्चों की इस बढ़ती संख्या को अपनी सभ्यता की असली पहचान माने।
तीन करोड़ बच्चे हमारे विकास का प्रमाण नहीं —
वे हमारी नैतिक हार की लाशें हैं।
