कलम का खून हो रहा है!
2024–25 में डिजिटल और स्थानीय पत्रकारों की हत्याएँ एक खुली चेतावनी हैं
यह कोई सामान्य अपराध नहीं है। यह पत्रकारिता पर सीधा हमला है। वर्ष 2024 और 2025 (दिसंबर 2025 तक) में जिन पत्रकारों की हत्या हुई, वे बड़े न्यूज़रूम के सुरक्षित स्टूडियो में नहीं थे — वे मोबाइल, कैमरा और सच लेकर ज़मीनी सच्चाई के बीच खड़े थे।
इन हत्याओं ने साफ कर दिया है कि आज भारत में डिजिटल मीडिया का पत्रकार होना सबसे खतरनाक पेशों में से एक बन चुका है।
🔥 वर्ष 2024: जब सच बोलने वालों को मिटाया गया
- आशुतोष श्रीवास्तव – मई 2024 में हत्या। सवाल पूछने की सज़ा मिली।
- शिवशंकर झा – 2024 में मारे गए पत्रकारों में शामिल। उनकी आवाज दबा दी गई।
- सलमान अली खान – 2024 की पत्रकार हत्याओं की एक और कड़ी।
- गौरव कुशवाहा – जुलाई 2024, मुजफ्फरपुर। यूट्यूब के लिए पत्रकारिता कर रहे थे। परिवार के अनुसार, लगातार धमकियाँ मिल रही थीं — लेकिन सुरक्षा शून्य थी।
🔥 वर्ष 2025: खामोशी के बदले खून
- मुकेश चंद्रकार – जनवरी 2025, छत्तीसगढ़। “बस्तर जंक्शन” यूट्यूब चैनल के जरिए सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार उजागर कर रहे थे। नतीजा: हत्या।
- राघवेंद्र बाजपेयी – मार्च 2025, उत्तर प्रदेश। पत्रकार और RTI कार्यकर्ता। सवाल पूछे — जानलेवा हमला झेला।
- नरेश कुमार – जुलाई 2025, ओडिशा। स्थानीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
इन सभी हत्याओं में एक खतरनाक समानता है। पत्रकार भ्रष्टाचार, अवैध रेत खनन, भूमि माफिया और संगठित अपराध के खिलाफ लिख रहे थे।
यह संयोग नहीं है — यह एक सिस्टमेटिक साइलेंसिंग है। जहाँ गोली, चाकू और हमला, जवाब बन चुके हैं।
कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) साफ कहती है — भारत में मारे जाने वाले अधिकतर पत्रकार छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के स्थानीय रिपोर्टर होते हैं। न्याय की कमी ही अगली हत्या की ज़मीन तैयार करती है।
यह सिर्फ शोक व्यक्त करने का समय नहीं है। यह सवाल पूछने, जवाब मांगने और जवाबदेही तय करने का समय है।
अगर डिजिटल मीडिया के पत्रकारों की ये कुर्बानी यूँ ही भुला दी गई, तो अगली खबर किसी और पत्रकार की हत्या होगी।
