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अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति में कविता का प्रवेश

संपादकीय | जयंती विशेष

राजनीति जब शोर, कटुता और तात्कालिक लाभ का अखाड़ा बन जाए, तब अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व इतिहास में नहीं — संस्कृति में दर्ज होते हैं।

अटल जी सत्ता के शिखर पर पहुँचे, लेकिन सत्ता कभी उनके व्यक्तित्व के ऊपर नहीं बैठी। वे प्रधानमंत्री थे, फिर भी पहले मनुष्य, फिर कवि और अंत में राजनेता रहे।

आज उनकी जयंती पर सवाल यह नहीं कि उन्होंने कितनी योजनाएँ शुरू कीं, सवाल यह है कि उन्होंने राजनीति को कितना मानवीय बनाया।

विपक्ष में रहते हुए भी विश्वसनीय

अटल बिहारी वाजपेयी उस दौर के नेता थे जब विपक्ष होना सरकार को गिराने की साजिश नहीं, बल्कि सरकार को बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी माना जाता था।

वे असहमति रखते थे, लेकिन अपमान नहीं। यही कारण था कि विरोधी भी कहते थे — “हम अटल से सहमत नहीं हैं, लेकिन अटल पर संदेह नहीं कर सकते।”

प्रधानमंत्री जिसने युद्ध नहीं — संवाद चुना

पोखरण के बाद भी दुनिया से आँख मिलाकर खड़ा भारत, और लाहौर बस में बैठा प्रधानमंत्री — यह साहस किसी साधारण राजनेता के बस की बात नहीं थी।

अटल जी ने राष्ट्रवाद को क्रोध नहीं, आत्मविश्वास दिया। देशभक्ति को नारे नहीं, नीति दी।

कविता जो सत्ता से बड़ी थी

हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा…

यह कविता नहीं थी — यह उनका राजनीतिक दर्शन था। आज जब शब्द हथियार बन चुके हैं, तब अटल जी की भाषा मरहम लगती है।

आज अटल जी क्यों ज़्यादा याद आते हैं?

क्योंकि आज राजनीति में आवाज़ तो है, पर वज़न नहीं। संख्या है, पर संवेदना नहीं। विजय है, पर विनम्रता नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी याद आते हैं, क्योंकि वे बताते हैं कि शक्ति में भी शालीनता संभव है।

श्रद्धासुमन 

अटल बिहारी वाजपेयी किसी दल की धरोहर नहीं थे। वे भारतीय लोकतंत्र की सभ्यता थे।

उनकी जयंती पर पुष्प चढ़ाने से ज़्यादा ज़रूरी है उनकी तरह बोलना, सुनना और असहमत होना सीखना।

अटल जी चले गए, लेकिन उनकी कमी आज भी सत्ता के हर गलियारे में गूंजती है।

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