कागज़ों में मजदूरी, ज़मीन पर सन्नाटा
जीआरएस की कथित हेराफेरी पर बड़ा सवाल – सचिव और सरपंच क्या कर रहे थे?
मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना अगर काग़ज़ों तक सिमट जाए और सरकारी राशि का खेल पंचायत कार्यालय से ही खेला जाए, तो सवाल सिर्फ़ एक कर्मचारी पर नहीं टिकता — सवाल पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है।
मामला : ग्राम पंचायत कठोतिया
सोशल मीडिया पर मौजूद जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत कठोतिया में पदस्थ जीआरएस द्वारा काग़ज़ों में मजदूरी दिखाकर सरकारी राशि की कथित खुर्द-बुर्द की गई! मजदूरों के नाम दर्ज हैं, भुगतान दर्शाया गया है, लेकिन ज़मीन पर काम नदारद है! इसके साथ ही बिलों में अनियमितता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं!
सवाल सीधे हैं, जवाब ज़रूरी हैं
- क्या यह सब सचिव और सरपंच की जानकारी के बिना संभव था?
- क्या पंचायत के रिकॉर्ड, मस्टर रोल और भुगतान सूची पर हस्ताक्षर यूँ ही हो गए?
- क्या निरीक्षण सिर्फ़ औपचारिकता बनकर रह गया है?
- अगर जानकारी थी — तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- अगर जानकारी नहीं थी — तो यह घोर लापरवाही नहीं तो क्या है?
मनरेगा में हर स्तर पर पारदर्शिता और सामाजिक अंकेक्षण की बात की जाती है, लेकिन कठोतिया पंचायत का यह मामला बताता है कि जवाबदेही का ढांचा केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गया है।
अब कार्रवाई किस पर?
इस पूरे प्रकरण में सिर्फ़ जीआरएस को कटघरे में खड़ा करना पर्याप्त नहीं है। जांच का दायरा सचिव और सरपंच की भूमिका तक बढ़ाया जाना चाहिए। रिकॉर्ड की जांच, मजदूरों के बयान और भुगतान की सत्यता सामने आनी चाहिए।
अगर पंचायत स्तर पर ही जवाबदेही तय नहीं होगी, तो मनरेगा जैसी योजनाएं रोज़गार नहीं, घोटालों का माध्यम बनती रहेंगी।
अगले अंक में जारी...
