प्रेम विवाह की सज़ा:
विदिशा में जिंदा बेटी की निकाली गई अंतिम यात्रा
“यह हमारे अरमानों की अर्थी है” — भाई का बयान
सवाल यह नहीं कि बेटी ने प्रेम विवाह क्यों किया,
सवाल यह है कि क्या समाज को किसी जिंदा इंसान को मार देने का नैतिक अधिकार है?
मध्यप्रदेश के विदिशा शहर से सामने आई यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, यह उस सोच का आईना है जो आज भी लड़की को स्वतंत्र नागरिक नहीं, बल्कि परिवार की “इज्जत” की संपत्ति मानती है।
माता-पिता की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह करने पर एक युवती को उसके ही परिवार ने सामाजिक रूप से मृत घोषित कर दिया। ढोल-नगाड़ों के साथ प्रतीकात्मक अर्थी निकाली गई, श्मशान घाट में आटे के पुतले का दहन किया गया, और रस्में निभाकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि मानो बेटी अब इस दुनिया में मौजूद ही नहीं है।
कानून क्या कहता है?
भारत का संविधान किसी भी वयस्क महिला को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि सहमति से किया गया प्रेम विवाह कोई अपराध नहीं — चाहे जाति अलग हो या समाज की सोच।
कानून ने आज़ादी दी है,
लेकिन समाज ने सज़ा तय कर रखी है।
लड़की और लड़के के लिए अलग नियम?
यही इस पूरे मामले का सबसे कड़वा सच है। लड़का प्रेम विवाह करे तो “अपने फैसले का मालिक” कहलाता है, लेकिन लड़की वही करे तो परिवार की बदनामी, संस्कारों का अपमान, और कभी-कभी सामाजिक मौत का फरमान।
अगर यही प्रतीकात्मक अर्थी किसी बेटे की निकाली जाती, तो क्या समाज इसे सही ठहराता? अगर नहीं, तो फिर यह न्याय नहीं — खुला लैंगिक भेदभाव है।
ऑनर नहीं, यह हिंसा है
इसे ऑनर किलिंग का “सॉफ्ट वर्ज़न” कहना गलत नहीं होगा। शरीर को नहीं मारा गया, लेकिन पहचान, रिश्ते, और सम्मान — सब कुछ जला दिया गया।
जो समाज जिंदा बेटी की अर्थी निकाल सकता है,
वह कल किसी और बेटी की चिता भी सजा सकता है।
यह घटना चेतावनी है — कि अगर अब भी सवाल नहीं उठाए गए, तो “पसंद” एक अपराध बनी रहेगी, और बेटी हमेशा कटघरे में खड़ी रहेगी।
असहमति रखें, संवाद करें — लेकिन बेटी को सज़ा नहीं, अधिकार दीजिए।
