जेसीबी से तालाब, फर्जी निराकरण से फाइलें!
सचिव सत्यनारायण कौरव के मामले में जांच से पहले ही क्लोज़ करने पर आमादा प्रशासन?
मोहपानी में जेसीबी मशीन से बनाए गए तीन तालाब अब सिर्फ एक निर्माण विवाद नहीं रहे। यह मामला पंचायत, जनपद और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत की ओर साफ़ इशारा करता है।
सबसे खतरनाक तथ्य यह नहीं कि जेसीबी चली—
बल्कि यह है कि बिना जांच के ही मामले को बंद करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं।
बिना जांच, बिना सत्यापन—सीधे “निराकरण”!
सूत्रों के अनुसार चिचली जनपद के अधिकारी जमीनी जांच से पहले ही फर्जी निराकरण रिपोर्ट तैयार करने में जुटे हैं। न स्थल निरीक्षण, न तकनीकी परीक्षण, न मजदूरों की उपस्थिति का सत्यापन— फिर भी कागज़ों में सब कुछ “नियमों के अनुरूप” दिखाने की कवायद जारी है।
सवाल उठता है कि जब कोई गड़बड़ी नहीं थी, तो जांच से प्रशासन इतना क्यों घबरा रहा है?
“सब गांव वालों की मिलीभगत से हुआ है” —
यह बयान सफाई नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का आत्मविश्वास है।
जेसीबी क्यों चली? मजदूर कहां गए?
- अगर काम मनरेगा नियमों से हुआ, तो मशीन का उपयोग क्यों?
- मजदूरों की हाजिरी और भुगतान रिकॉर्ड कहां हैं?
- क्या पंचायत प्रस्ताव और तकनीकी स्वीकृति सार्वजनिक की जाएगी?
इन सवालों के जवाब देने के बजाय, स्थानीय प्रशासन फाइलें बंद करने और मामला रफा-दफा करने में लगा दिखाई दे रहा है।
किसके दबाव में चिचली जनपद अधिकारी?
यह संयोग नहीं हो सकता कि जांच की मांग उठते ही फर्जी निराकरण तैयार होने लगें। यह रवैया बताता है कि या तो अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव है, या फिर पूरा तंत्र खुद कटघरे में खड़ा है।
प्रशासन का यह व्यवहार एक खतरनाक संदेश देता है—
“भ्रष्टाचार करो, हम कागज़ों में सब संभाल लेंगे।”
यह सिर्फ तीन तालाबों का मामला नहीं
यह लड़ाई है गरीब मजदूरों के हक, मनरेगा जैसी योजना की साख और जवाबदेही से भागते प्रशासन के खिलाफ।
अगर यह मामला बिना निष्पक्ष जांच के बंद कर दिया गया, तो आने वाले समय में हर पंचायत में जेसीबी चलेगी और फर्जी निराकरण बनेगा।
