लाडली बहना को पैसा मिल रहा है…
नगर पालिका कर्मचारियों का वेतन अटका है,
और मनरेगा का नाम बदलकर पुराने पाप ढके जा रहे हैं!
यही है ‘डबल इंजन’ भाजपा सरकार का सुशासन?
मध्य प्रदेश सरकार यह तर्क देती है कि लाडली बहना योजना समय पर चल रही है। ठीक है — यह मान लिया गया।
लेकिन इसके साथ ही सरकार को उन सवालों का जवाब भी देना होगा, जो ज़मीन पर गूंज रहे हैं —
अगर सरकार योजनाओं को समय पर चला सकती है,
तो नगर पालिका कर्मचारियों को समय पर वेतन क्यों नहीं?
और मनरेगा मजदूरों के नाम पर हुए अरबों के भ्रष्टाचार का क्या हुआ?
नगर पालिका कर्मचारी: सरकार के नहीं क्या?
नगर पालिका कर्मचारी वही लोग हैं जो शहर को चलाते हैं — सफाई, नालियां, पानी, रोशनी, आपदा प्रबंधन।
लेकिन यही कर्मचारी महीनों से वेतन के लिए आंदोलन कर रहे हैं। कभी बजट का बहाना, कभी तकनीकी अड़चन — और अक्सर खामोशी।
क्या मेहनत के बदले वेतन मांगना गुनाह हो गया है?
या सुशासन सिर्फ पोस्टर तक सीमित है?
मनरेगा: नया नाम, नए दावे — पुराने घोटाले जस के तस
अब मनरेगा मजदूरों के सामने योजना को नए नाम और नए वादों के साथ पेश किया जा रहा है। कहा जा रहा है — पारदर्शिता बढ़ेगी, व्यवस्था सुधरेगी।
लेकिन सच्चाई यह है कि मनरेगा में अरबों रुपये का भ्रष्टाचार सामने आ चुका है —
- फर्जी जॉब कार्ड
- बिना काम भुगतान
- कागजों में सड़कें, तालाब और भवन
- गांव में ज़मीनी हकीकत शून्य
नाम बदल देने से क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जाता है?
या यह पुराने घोटालों से ध्यान भटकाने की कवायद है?
डबल इंजन सरकार या डबल मापदंड सरकार?
जब बात आती है —
- चुनावी योजनाओं की → पैसा समय पर
- कर्मचारियों के हक़ की → देरी और बहाने
- भ्रष्टाचार की → चुप्पी
तो जनता पूछने को मजबूर है —
यह डबल इंजन विकास का है
या डबल मापदंड का?
अब सवाल योजनाओं का नहीं, नीयत का है
मनरेगा मजदूर हों या नगर पालिका कर्मचारी — उनका मेहनताना कोई एहसान नहीं, अधिकार है।
अगर सरकार योजना का नाम बदल सकती है, प्रचार कर सकती है, मंच से दावे कर सकती है —
तो भ्रष्टाचार पर कार्रवाई भी कर सकती है,
और वेतन समय पर दे भी सकती है।
और अगर यह सब नहीं हो पा रहा, तो ‘सुशासन’ और ‘डबल इंजन’ सिर्फ नारे हैं — सच्चाई नहीं।
