जन प्रतिनिधियों के मीडिया ट्रायल के अलावा भी मीडिया बहुत कुछ कर सकता है!
लेकिन देखने में आता है कि,जमीनी मुद्दे तो छोड़ दिए जाते हैं। शहर, गांव, बस्ती, कस्बे में और भी ऐसे अनेक मुद्दे हैं,जिन पर लिखने बोलने की जरूरत है,लेकिन मीडिया किन मुद्दों पर रोज बात कर रहा है? आप रोज क्या पढ़ रहे हैं ,यह बेहद महत्वपूर्ण है! लेकिन देखने में यह आ रहा है कि,सिर्फ जानकारियां ठेली जा रही हैं,उन पर न कोई गहन चर्चा,न वैचारिक विमर्श!
आप खुद सोचिए कि स्थानीय स्तर पर प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपने कितनी बार यह लाइन सुनी या पढ़ी होगी कि, हमारी खबर का असर...! शायद बहुत कम ,,क्यों...? इसकी वजह क्या है? और इसका मतलब क्या?
एक मतलब तो जाहिर तौर पर यह आता है कि,अब तक जो खबरें प्रकाशित हुई , ,उन खबर का कोई असर नहीं हुआ, ,इसलिए साल भर में दो चार खबरें असर कर गई तो जनता को बताना पड़ता है कि,ये हमारी खबर का असर है,,,! हैं ना कितनी मजेदार बात।
तो आइए अब हम इस मसले पर और भी गंभीरता से चर्चा करते हैं।
दरअसल अपने आप को श्रेष्ठ दिखाने के फेर में कई बार मीडिया ट्रायल की हद से गुजर जाता है।
आप यहां एक बात पर और गौर कीजिए...! मीडिया का आंतरिक टकराव इसे और भी जटिल बना रहा है। विज्ञापन की होड़ ने एक तरह की अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है,जो सामान्य आम जन नहीं देख सकते!
मीडिया के आंतरिक टकराव की यह अदृश्य दीवार पत्रकारों में अहम का भाव पैदा कर देती है। इसका असर स्थानीय स्तर की पत्रकारिता पर गहरा पड़ता है। इस वजह से किसी भी मुद्दे पर या एक मंच पर अक्सर मीडिया की उपस्थिति नगण्य दिखाई देती है।
इसका दुष्प्रभाव आपको देखना है तो फेसबुक पर इसके अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। भाषाई मर्यादा यहां तार तार हो जाती है। इतनी गंदी भाषा की आप सोच में पड़ जायेंगे कि क्या ये मीडिया की भाषा है।
लेकिन यही कड़वी सच्चाई है, क्योंकि जब उद्देश्य बदल जाते हैं, तो शब्द भी अपना चरित्र खो देते हैं…!
और जब पत्रकारिता का चरित्र कमजोर पड़ता है, तो समाज का जनमत भी दिशाहीन होने लगता है। यही वह समय होता है जब असली मुद्दे पीछे धकेल दिए जाते हैं और दिखावे व आरोप-प्रत्यारोप की पत्रकारिता आगे आ जाती है।
यानी स्थिति यह है कि, जो पत्रकार सवाल उठाने के लिए पैदा हुआ था, वही अब सवालों से बचने लगा है,क्योंकि उसे पता है कि उसके सवालों के जवाब कई बार उसके अपने ही घर का शीशा चकनाचूर कर देंगे।
आप गहराई से सोचिए — जब पत्रकार अपने ही साथी पत्रकारों पर सोशल मीडिया पर वार करता है, तो क्या वह भ्रष्टाचार पर वार कर पाता है? शायद नहीं! क्योंकि उसकी ऊर्जा एक-दूसरे को गिराने में खर्च हो रही है, जनहित के मुद्दे उठाने में नहीं!
यह दौर बेहद चिंताजनक है — जहां पत्रकारिता एक मिशन न रहकर एक प्रतिस्पर्धा का बाजार बन गई है।
जनता के बीच भरोसे की जो मजबूत नींव थी, वह अब धीरे-धीरे ढहती जा रही है। लोग कहते हैं — “मीडिया बिक चुका है!” लेकिन असल बात यह है कि, मीडिया बिकता नहीं है… बल्कि उसे बिकने पर मजबूर किया जाता है!
और मजबूरी कैसी? रोजगार का दबाव, बढ़ते खर्चे, विज्ञापन की राजनीति, और एक अदृश्य नियंत्रण — जो पत्रकारिता को अपने हिसाब से नचाता है।
अब जरूरत इस बात की है कि, मीडिया स्वयं के भीतर झांके और पूछे — “हम किसके लिए हैं? सत्ता के लिए या जनता के लिए?”
क्योंकि जब मीडिया जनता के लिए काम करता है, तब ही लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन आज तो हालात उल्टे हैं… जनता सवाल पूछ रही है और मीडिया जवाब देने में व्यस्त है!
सवाल यह भी है कि, जो खुद सवालों के घेरे में हो, वह औरों पर ईमानदारी का पहरा कैसे लगा सकता है?
और जरा सोचिए… जब पत्रकारिता सिर्फ चर्चाओं तक सीमित हो जाए, जमीनी रिपोर्टिंग गायब हो जाए, तो आम जनता की आवाज़ कौन उठाएगा?
क्या फेसबुक पोस्ट ही रिपोर्टिंग बन जाएगी? क्या व्हाट्सएप फॉरवर्ड ही असली खबरें तय करेंगे? क्या यू-ट्यूब की बहसबाजी ही सच्चाई कहलाएगी?
यह परिवर्तन डराने वाला है!
क्योंकि पत्रकारिता की असल शक्ति — मुद्दे उठाने से नहीं, मुद्दों को समाधान तक ले जाने से साबित होती है।
लेकिन जब मीडिया ही मुद्दों को बीच रास्ते छोड़ दे, तो समाज का भरोसा टूटना लाजिमी है।
अक्सर देखने में आया है कि, रिपोर्टर जल समस्याओं पर खबर लिखता है, लेकिन तीन दिन बाद पानी टैंकर का फोटो लगाकर खुद ही वाहवाही लूटने लग जाता है।
किसलिए? केवल इस बात के लिए कि “हमारी खबर का असर…” लिख सके!
ये तो वही बात हुई — घाव भरने से पहले पट्टी का सेल्फी!
पत्रकारिता अगर सचमुच असरदार है, तो असर को प्रमाण की जरूरत नहीं पड़ती… असर खुद जनता की जिंदगी में दिखाई देता है।
अब जरूरत किस बात की है?
- पत्रकार अपने आपसी टकराव को छोड़कर सामूहिक रूप से जनहित के विषयों पर खड़ा हो
- मुद्दे चुनते समय किसी व्यक्ति, दल, कमीशन या विज्ञापनदाता का डर न हो
- खबरों में शोर नहीं — शोध हो
- केवल सूचना नहीं — समाधान की दिशा भी हो
- शब्दों में नहीं — मिशन में ताकत झलके
अगर मीडिया फिर से वह साहस जुटा ले, तो समाज में बदलाव की सबसे तेज़ चिंगारी फिर से वही जला सकता है…
क्योंकि इतिहास गवाह है — जब भी सत्ता बेलगाम हुई है, कलम ही उसकी लगाम बनी है।
और यह समय फिर उसी लगाम को कसने का है!
