रिश्वतखोर अधिकारियों से न्याय की उम्मीद? यह तो न्याय का अपमान है!
जिले की प्रशासनिक व्यवस्था इस कदर सड़ चुकी है कि गबन की शिकायतें उठने से पहले ही दफना दी जाती हैं। भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए तंत्र की चुप्पी अब संयोग नहीं, बल्कि एक संगठित संरक्षण तंत्र बन चुकी है।
मोहपानी मामले में चार लाख के गबन के आरोपी सचिव सत्यनारायण कौरव पर जांच और कार्यवाही को प्रशासन ने सार्वजनिक क्यों नहीं किया?
क्या कारण है कि इतना गंभीर मामला पर्दे के पीछे सड़ने दिया गया? जनता को सच्चाई से दूर रखने की यह कोशिश आखिर किसे बचाने के लिए की जा रही है?
बरहेटा में भ्रष्टाचार का महल!
बरहेटा में सरपंच पति ने सरकारी जमीन पर भ्रष्टाचार का महल खड़ा करने का दुस्साहस कैसे कर लिया? क्या उसे पहले से पता था कि प्रशासन उसका एक बाल भी बांका नहीं करेगा?
पुरगवां और रांकई में गबन — अधिकारी मौन क्यों?
पुरगवां में गबन, रांकई में गबन… और अधिकारियों की चुप्पी मानो सांठगांठ का मौन आश्वासन बन चुकी है। शिकायतें दर्ज हैं, सबूत मौजूद हैं… पर कार्रवाई? कहीं दिखाई नहीं देती!
हालात यह साफ करते हैं कि जिले में अब ईमानदारी किनारे बैठी है, और भ्रष्टाचार सत्ता की गोद में पल रहा है। शिकायतकर्ता परेशान हैं, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के लिए सुरक्षा कवच तैयार रखा जाता है।
क्या न्याय भी "सेटिंग" बन चुका है?
यह सवाल अब हर ईमानदार नागरिक के मन में है— क्या न्याय मिलेगा, या न्याय भी उन्हीं की जेब में है जिनके हाथ पहले से ही रिश्वत की कालिख से काले पड़े हैं?
यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, यह लोकतांत्रिक भरोसे पर सबसे करारी चोट है।
