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अंग प्रदर्शन का धर्म संस्करण

भक्ति अब भाव नहीं, ब्रांडिंग बन चुकी है। नदियों के तट पर अब श्रद्धा से ज़्यादा “शॉट” पर ध्यान रहता है — कैमरे का एंगल, चेहरे की अभिव्यक्ति और सोशल मीडिया के लिए परफेक्ट फ्रेम।

धर्म अब भीतर की साधना नहीं, बाहर की सजावट में बदल गया है।

कल तक दूध बहाने की परंपरा तो थी शुद्धिकरण की, पर आज वही दूध बहाव “फॉलोअर्स” के लिए हो रहा है। गीले वस्त्रों में दिखाई देने वाली आस्था से ज़्यादा असर डालती है तस्वीरें — और यही है आज का नया धार्मिक ट्रेंड: “अंग प्रदर्शन का धर्म संस्करण”

इस समय यूट्यूब पर धर्म को लेकर एक अलग ही तरह की दुनिया दिखाई जा रही है!सनातन संस्कृति के नाम पर यह सिर्फ आस्था और परंपराओं से खिलवाड़ ही नहीं बल्कि धर्म का भी अपमान ही है!

आप इसे आजादी के नाम पर लोगों के नजरिए से जोड़कर इस मुद्दे को सिरे से खारिज नहीं कर सकते!

प्रयागराज के तट पर पारदर्शी सफेद साड़ी में लिपटी हुई महिला जिसका शरीर भीगा हुआ है,जिसकी वजह से उसकी देह धार्मिक नहीं उत्तेजक मुद्रा के भाव को प्रकट कर रही है!

इसी प्रकार नवरात्र डांडिया, कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों के दौरान कई बार अनेक स्थानों से अश्लील गानों पर उत्तेजक डांस किए जाने की खबरें सुर्खियां बनीं!

जिस उत्तेजक मुद्रा के साथ युवतियां,महिलाएं भौंडा दैहिक नृत्य प्रदर्शन करती हैं उसे देखकर नृत्य प्रदर्शन नहीं बल्कि देह प्रदर्शन महसूस होता है!

जिस अंदाज में शिव को दूध चढ़ाया जा रहा है,उसे देखकर यही लगता है कि,यह धार्मिकता नहीं बल्कि धार्मिकता के आडंबर की आड़ में लाइक और व्यू का खेल है!

आज की इस पीढ़ी में धर्म को बैसाखी बनाकर धार्मिक/सांस्कृतिक मर्यादाओं का सीधे तौर पे गला घोंटा जा रहा है और विडम्बना यह है कि सभी मुक दर्शक बन कर इस अश्लीलता अनैतिकता को देख व स्वीकार कर रहे हैं !क्या इस तरह का आचरण उचित है? आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि हम धर्म को, हमारी धार्मिक मान्यताओं को धूल धूसरित होते देख रहे हैं किन्तु कुछ कह नहीं पाते, इन्हें रोकने का कोई सार्थक कदम नहीं उठाते?

समाज के जिम्मेदार लोगो को चाहिए कि धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर किसी तरह की अश्लीलता को पूरी तरह से रोकने में आगे आये और जो भी धार्मिक कथा और सनातन से जुड़ी बाते हो उसी का आचरण और मंचन किया जाए। 

क्योकि आज यदि हम थोडी सी लापरवाही करते है तो आगे आने वाली पीढी कैसे अपनी जिम्मेदारियों को समझेगी और एक दिन ऐसा आयेगा कि हमारी धार्मिक स्वच्छंदता ही कलंक बन जायेगा!

जो कभी मंदिरों में मौन साधना होती थी, वह अब मोबाइल कैमरों की गूंज में खो गई है। धर्म जब तमाशा बन जाता है, तो भक्ति भी बिकने लगती है — बस प्लेटफ़ॉर्म अलग-अलग हैं, नीयत वही पुरानी।

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