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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

भ्रष्टाचार पर पलने वाले, पड़ गए इज्जत बचाने के लाले!

गरीब मजदूरों के हिस्से के पैसों से मशीन से तालाब बनाकर कमिशन खोरी करने वाले भ्रष्टाचारियों को अब अपनी इज्जत बचाने के भी लाले पड़ गए हैं?

ऐसी स्थिति आखिर क्यों बनी? क्योंकि इन लालचियों ने चंद पैसों के लालच में अपने घर की इज्जत को भी पंचायत में घसीट लाए! मनरेगा मजदूरी को चाटने के लिए पत्नी को भी कागजी मजदूर बना दिया!

अब और साफ — ये सिर्फ गलती नहीं, ये बेरहमी से की गई साज़िश है। तालाब नहीं बने, इन्साफ का गड्ढा खुद इनके लिए खोदा गया है। जहां मजदूरों के पसीने की कमाई होनी चाहिए थी, वहीं कागज़ों पर गड़बड़ करके परिवार का थैला भर लिया गया।

किसने सोचा था कि कुछ नोटों की आड़ में इंसान की इज्जत बिक जाएगी? पत्नी को 'कागज़ का मजदूर' बनाना, खर्च की चौखट पर बैठकर खुद को बचाना — यह कोई शर्मनाक चाल है, लेकिन सबसे शर्मनाक यह कि उन्होंने शर्म को बेचकर धंधा चलाया।

कागज़ों के किले अब ढहने लगे हैं — और जब वे ढहेंगे तो भीतर छुपा वह नकाब, वह ढोंग सब उजागर होगा।

इनकी सफाई सुनने लायक नहीं — बहाने बनेंगे, तारीखों की अदला-बदल होगी, रसीदों पर जादू होगा। पर बात सादी है: जो मजदूर की रोटी के पैसे के हक से खिलवाड़ करेगा, वह इंसान नहीं, धोखेबाज़ है। और धोखा करने वालों की कलई खुलती है — चाहे कितना भी कागज़ पलट लो, सच की दाढ़ी नहीं कटती।

अब वक्त आ गया है शिकायतों को हवा देने का — जब तक आवाज़ें दबती रहीं, ये लोग मनमानी करते रहे। पर आज जब सच्चाई की रोशनी पड़ी है, तो इनकी सारी बनावट नंगी होकर सामने आ जाएगी।

और जो लोग सोच रहे हैं कि नाम नहीं जुड़ने से बच निकलेंगे — याद रखिए, नंगा होना कोई व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि उनके कामों का, उनके प्रवृत्तियों का सुस्पष्ट दंड है। इज्जत वही है जो कर्म से मिलती है — और इन कठघरे में जिस इज्जत की कीमत पर खेल हुआ, उसे अब कोई सुधार नहीं बेच पाएगा।

इज्जत बिकाऊ नहीं — और जो बेचते हैं, उनकी नाक शर्म से झुकती है। बस अब झुकने का समय आ गया है।

यह खबर सिर्फ आगाह करती है — और आगाह करने से ही बदलती है हालात। जो लोग अपने नामों पर, कागज़ों पर और दूसरों की मेहनत पर तानाशाही कर रहे हैं — आपकी बचने की हर जगह सिकुड़ती जा रही है। सच के सामने हर चाल धीमी पड़ जाती है।

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