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*खाते में सरकारी मजदूरी का पैसा जा पहुंचा — जबकि मिट्टी तक हाथ से नहीं हिली?: मोहपानी चिचली नरसिंहपुर*
🔥 ग्राम मोहपानी का फर्जी मजदूरी कांड उजागर
जिस योजना का मकसद था गरीब और आदिवासी परिवारों को रोज़गार देना, वही अब परिवार विशेष की कमाई का जरिया बन गई है!
सूत्रों के हवाले से बड़ा खुलासा — ग्राम पंचायत मोहपानी में मनरेगा के नाम पर फर्जीवाड़े की मोटी परतें खुलने लगी हैं!
तालाब निर्माण का काम जहां पूरी तरह जेसीबी मशीन से कराया गया, वहीं कागज़ों पर मजदूरों की फौज खड़ी कर दी गई!
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक,
👉 सोमनाथ कौरव, उनकी पत्नी और भाई दीपक कौरव के नाम पर भी मजदूरी का भुगतान किया गया।
👉 इतना ही नहीं, नंदकुमार कौरव और उनकी पत्नी को भी मजदूर बताकर मनरेगा की राशि ट्रांसफर कर दी गई!
👉 वहीं मोहन ध्रुवे और भैया राम के खाते में भी सरकारी मजदूरी का पैसा जा पहुंचा — जबकि मिट्टी तक हाथ से नहीं हिली!
इन नामों की फेहरिस्त देखकर ऐसा लगता है मानो सतनारायण कौरव किसी विशेष समुदाय पर खास मेहरबान हैं।
ज्वलंत सवाल —
जब तालाब मशीन से खुदा, तो मजदूरी कागज़ी मजदूरों को क्यों दी गई?
गांव में चर्चा जोरों पर है कि यह पूरा खेल कमीशन की नाली में बह गई रकम का है!
कौन-कौन इस खेल में शामिल था? किसने मजदूरों की मेहनत की रोटी पर डाका डाला?
अब ये जांच का विषय है — लेकिन जनता जवाब चाहती है!
“मनरेगा में मेहनतकशों का हक छीनने वाले कब पकड़े जाएंगे?”
— यही सवाल अब हर चौराहे पर गूंज रहा है।
जहां सरकार गरीबों के हाथों में रोजगार की चमक देना चाहती है, वहीं मोहपानी पंचायत में कुछ प्रभावशाली लोग भ्रष्टाचार की गंगा बहाने में जुटे हैं!
वहीं दूसरी ओर, पंचायत की भरिया आदिवासी महिला सरपंच झुनिया बाई इस पूरे सिस्टम की लचर व्यवस्था की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं।
उनकी आवाज़ दबाई जा रही है, और जातिगत प्रभाव रखने वाले लोग सत्ता और जाति दोनों का खेल खेलते दिखाई दे रहे हैं।
अब सवाल यही उठता है —
क्या जाति और रसूख के आगे कानून झुक जाएगा?क्या आदिवासी महिला सरपंच का दायित्व सिर्फ नाम तक सिमटकर रह जाएगा?
