नए लेबर कानून का विरोध — मजदूर संगठन क्यों कह रहे हैं यह कानून गलत?
1. "हायर एंड फायर" में आसानी — नौकरी की सुरक्षा खतरे में
नए लेबर कोड में छंटनी की सीमा बढ़ाई गई है। इससे बड़ी संख्या में उद्योग बिना अनुमति के कर्मचारियों को निकाल सकेंगे, जिसके कारण नौकरी की स्थिरता और सुरक्षा दोनों प्रभावित होंगी।
"यह कानून नौकरी को अधिकार नहीं बल्कि नियोक्ता की सुविधा बना देता है।" — मजदूर संगठन
2. यूनियन और हड़ताल अधिकार कमजोर
हड़ताल के लिए बढ़ाई गई नोटिस अवधि और जटिल प्रक्रियाएँ ट्रेड यूनियन की शक्ति खत्म कर देती हैं। इससे सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता घटती है।
3. फिक्स्ड-टर्म रोजगार — स्थायी नौकरी का अंत?
फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट से कंपनियाँ स्थायी भर्ती से बच सकती हैं। इससे मजदूरों के लिए असुरक्षा और अस्थायी रोजगार का खतरा बढ़ता है।
4. असंगठित क्षेत्र की अनदेखी
भारत के 90% मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं, लेकिन नए लेबर कोड में इनका कवर कैसे होगा, यह अस्पष्ट है। व्यावहारिक तौर पर वे अभी भी लाभ से बाहर रहेंगे।
5. सामाजिक सुरक्षा की अस्पष्ट व्यवस्था
Social Security Code में अंशदान की जिम्मेदारी, लाभ वितरण और गिग वर्करों की सुरक्षा पर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं।
6. परिभाषाओं में भ्रम
"श्रमिक", "कर्मचारी" और "वेतन" जैसी परिभाषाओं में अंतर होने से कानूनी विवादों की संभावना बढ़ती है और कंपनियाँ इसका फायदा उठा सकती हैं।
“29 पुराने श्रम कानूनों की सुरक्षा खत्म कर दी गई है।” — राष्ट्रीय मजदूर मंच
निष्कर्ष
मजदूर संगठनों का कहना है कि नए लेबर कोड नियोक्ताओं की सुविधा को प्राथमिकता देते हैं और मजदूरों के अधिकार कमजोर करते हैं। इसी कारण देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हो रहा है।
