आज खबरें खबर नहीं रहीं, बल्कि एक बाज़ार बन चुकी हैं। कोई दर्द, कोई अन्याय, कोई चीख — सबको तोलने लगा है समाज अपने मनोरंजन के तराजू पर। किसी की हत्या, किसी का बलात्कार, या किसी का धार्मिक नाटक — सब कुछ “क्लिक” और “व्यूज़” के हिसाब से बिकता है।
संवेदनाएँ मर नहीं रहीं, बस अब उन्हें देखने वाला समाज बदल गया है।
पत्रकारिता का काम सच्चाई को दिखाना है, पर दर्शक अब सच्चाई नहीं, तमाशा चाहते हैं। जो खबर जितनी ‘गरम’ हो, उतनी ‘वायरल’ होती है। यही कारण है कि सच्चे सवालों और ईमानदार कलमों की आवाज़ भीड़ के शोर में दब जाती है।
पर याद रहे — सच्चाई का मूल्य भले घट जाए, उसका अर्थ कभी नहीं मिटता। जब समाज थक जाएगा अपने ही दिखावे से, तब फिर वही सच्ची पत्रकारिता उसकी आँखों में उम्मीद बनकर लौटेगी।
✍️ विक्रम सिंह राजपूत
© STRINGER24 NEWS | सत्य और समाज के बीच की कड़ी.
