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 | रविवारीय विशेषांक |

कैसा ये प्यार है?


कभी सुना था कि प्यार आंखों में बसता है, अब लगता है मोबाइल के कैमरे में कैद हो गया है। पहले लोग एक-दूसरे को पाने के लिए जन्म-जन्म का वादा करते थे, अब दो महीने में ही “रिलेशनशिप स्टेटस” बदल जाता है।

आज जो इश्क़ सड़कों पर खून बनकर बह रहा है, वो मोहब्बत नहीं… वो समाज की नासमझी का दर्द है। लड़कियां प्यार के नाम पर जिस्म की नुमाइश कर रही हैं, और लड़के मोहब्बत के नाम पर खंजर उठा रहे हैं — अब बताओ, इसे प्यार कहें या पागलपन?

“अब तो प्यार भी दिखावे का खेल बन गया है — जहाँ तस्वीरों में मुस्कान होती है, पर अंदर से दोनों टूटे होते हैं।”

गांव की गलियों से लेकर शहर की सड़कों तक, अब इश्क़ पोस्ट में लिखा जाता है और कमेंट्स में तौला जाता है। लड़कियां सोचती हैं — सोशल मीडिया पर प्रेमी/bf के साथ फोटो डाल देने से प्यार अमर हो जाएगा, लेकिन कल वही तस्वीर किसी मज़ाक या बदनामी का ज़रिया बन जाती है।

बेटियों को कौन समझाए कि इज्ज़त जब इंटरनेट पर घूमने लगती है, तो समाज के नजरिए बदलने में देर नहीं लगती। और बेटों को कौन बताए कि अगर तुम किसी से सचमुच प्यार करते हो, तो उसकी जान नहीं, उसकी इज़्ज़त बचाओ।

“प्यार वो नहीं जो दुनिया को दिखाया जाए, प्यार वो है जो एक-दूसरे को संभाल ले जब दुनिया खिलाफ हो जाए।”

सच्चा इश्क़ वो होता है जो इंसान को बेहतर बनाए, न कि बर्बाद कर दे। मगर आज का समाज ‘लाइक’ और ‘फॉलो’ में उलझ गया है। अब राधा-मीरा वाला प्रेम कहां बचा है? अब तो मीरा की जगह इंस्टाग्राम की रील चल रही है।

प्यार कभी किसी की जान नहीं लेता, वो तो जान देने की हिम्मत देता है। मगर आज के दौर में ये भावनाएं जब सोशल मीडिया, दिखावे और झूठे अहंकार के बीच पिसती हैं, तो नतीजा खून के छींटे बनकर हमारे सामने आता है।

“कभी राधा-मीरा का प्रेम भक्ति का रूप था, अब वही मोहब्बत न्यूज़ हेडलाइन बन चुकी है।” 

प्रेम कभी बाजार का सौदा नहीं था, लेकिन आज रिश्तों में भी ‘रीचार्ज प्लान’ और ‘फॉलोअर्स’ की गिनती घुस आई है। युवाओं के लिए इश्क़ अब धैर्य की साधना नहीं, बल्कि तात्कालिक सनसनी बन चुका है। यही वह मोड़ है जहाँ प्रेम अपनी पवित्रता खो देता है और समाज अपनी दिशा।

गांवों से लेकर शहरों तक, हर जगह एक बेचैनी है — “किसे अपनाएं, किससे बचें?” मगर सच तो यह है कि असली प्रेम वही है जो किसी को चोट नहीं पहुँचाता, किसी की आत्मा को नहीं तोड़ता।हमारे समाज को चाहिए कि वो इस भटकाव के बीच संवाद तलाशे — परिवार, शिक्षा और मीडिया मिलकर यह सिखाएं कि प्रेम की पहली शर्त है ‘सम्मान’।

“इश्क़ अगर सही दिशा में हो, तो वह सबसे बड़ा संस्कार बन जाता है — और अगर भटक जाए, तो सबसे बड़ी त्रासदी।”हमें उस दौर में लौटना होगा जहाँ प्रेम एक अनुशासन था, विद्रोह नहीं। जहाँ किसी की आँखों में मोहब्बत देखी जाती थी, डर नहीं। 

यह समाज तभी स्वस्थ होगा जब इश्क़ फिर से इबादत बनेगा, जब रिश्तों में भरोसा लौटेगा — और जब ‘कैसा ये प्यार है?’ का सवाल एक दिन बदलकर हो जाएगा,  “वाह, ऐसा प्यार है!”

इसीलिए अब वक्त है रुककर सोचने का — कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? हम मोहब्बत को जी रहे हैं या उसे बाजार बना दिया है? प्यार अगर दिखाने की चीज़ बन गया, तो फिर उसकी रूह मर गई, बस शरीर बचा।

पंचायत रेडियो यही कहेगा — “प्यार में पवित्रता लौटाओ, अपने रिश्तों को शर्मिंदगी नहीं, इज़्ज़त दो।” तभी एक दिन ये सवाल बदल जाएगा — “कैसा ये प्यार है?” से “वाह! ऐसा प्यार हो तो ज़िंदगी धन्य हो जाए।”

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