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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

मोहपानी में तालाब-जेसीबी गबन का मामला — क्या जिले में मनरेगा को अघोषित रूप से खत्म कर दिया गया?

सचिव सत्यनारायण कौरव द्वारा तालाब में जेसीबी उतारकर किए गए गबन ने एक नए सवाल को जन्म दिया है — क्या जिले में मनरेगा मजदूरी योजना को चुपचाप खत्म कर दिया गया है?

यह समर्थन नहीं — बल्कि भ्रष्टाचार का खुला समर्थन है!

मोहपानी में आज जो दृश्य दिखाई दे रहा है वह सिर्फ गबन नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार + संरक्षण + मिलीभगत का नंगा खेल है। गांव के आदिवासी मजदूरों की मेहनत की रकम उन लोगों की जेब में जा रही है जिन्हें विकास करवाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

सवाल बड़ा है: अगर मनरेगा मजदूरी योजना सच में चल रही है, तो फिर मजदूर काम के लिए भटक क्यों रहे हैं? और कागजों में दिख रही मस्टरोल की मजदूरी आखिर किसकी जेब में जा रही है?

गांव में मनरेगा को लूटने वाले कोई बाहर के नहीं — गांव के अपने ही लोग हैं।

सचिव, सरपंच और भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियां भर रही हैं — और गांव वाले विकास का सपना देख रहे हैं।

यह भी साफ दिख रहा है कि आदिवासियों की आर्थिक स्थिति को जानबूझकर कमजोर बनाया जा रहा है ताकि वे हमेशा मजदूर बने रहें। विकास से दूर, योजनाओं से बाहर, और व्यवस्था की मार में फंसे हुए।

मुख्य सवाल

  • क्या मनरेगा योजना सिर्फ कागजों में चल रही है?
  • क्या गबन और कमीशनबाज़ी को संरक्षण मिलता है?
  • क्यों आदिवासी क्षेत्र की योजनाएँ हमेशा भ्रष्टाचार की बलि चढ़ती हैं?

यह मामला सिर्फ मोहपानी का नहीं — पूरे जिले की जड़ों को हिला देने वाला मुद्दा है।

अगले अंक में जारी:गबन के इस खेल में गांव की राजनीति....
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