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📰 Stringer24News 

सम्पादकीय

लोकतंत्र की दिशा और विपक्ष की दशा

आज देश में एक गंभीर सवाल उभर रहा है — क्या विपक्ष को कमजोर किया जाना, सरकार की ताकत है या उसकी कमजोरी? और इसके साथ ही यह भी कि अंधभक्त आलोचना से क्यों डरते हैं, तथा भाजपा सरकार विपक्ष को सशक्त बनाने के मुद्दे पर पिछड़ी क्यों नजर आती है?

🔴 सरकार की ताकत या डर?

यदि कोई सरकार विपक्ष को दबाने में ऊर्जा खर्च करती है, तो यह उसकी सत्ता की नहीं, बल्कि उसके डर की निशानी है। एक मजबूत लोकतांत्रिक सरकार अपने आलोचकों से भागती नहीं — उनसे संवाद करती है। लेकिन जब बहस का स्थान धमकी और तोड़फोड़ ले लेती है, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल हो जाती है।

जहां सवाल पूछने वाला नहीं होगा, वहां जवाबदेही भी नहीं बचेगी।

⚫ अंधभक्ति की मानसिकता और आलोचना का डर

अंधभक्ति असल में तर्क का परित्याग है। जब कोई व्यक्ति किसी नेता या पार्टी को त्रुटिहीन मान लेता है, तो आलोचना उसे अपनी आस्था पर प्रहार जैसी लगती है। इसलिए वह सवाल से नहीं, सवाल पूछने वाले से लड़ता है।

सोशल मीडिया के दौर में हर चर्चा अब विचार नहीं, ‘टीम’ में बंट चुकी है। राहुल गांधी या प्रियंका गांधी पर बात कीजिए, तो लोग पहले यह तय करते हैं कि आप “किस खेमे” के हैं — फिर प्रतिक्रिया देते हैं। यही कारण है कि संवाद की जगह अब शोर ने ले ली है।

जो खुद पर विश्वास रखता है, वह आलोचना से नहीं डरता। अंधभक्त इसलिए डरते हैं क्योंकि वे नेता पर भरोसा करते हैं, तर्क पर नहीं।

🟠 भाजपा सरकार और विपक्ष की स्थिति

भाजपा की सत्ता यात्रा ने उसे इस विश्वास तक पहुँचा दिया है कि “सत्ता ही स्थायित्व है, विपक्ष का मतलब अस्थिरता।” यही सोच उसे विपक्ष को सशक्त करने से रोकती है। सरकार का ध्यान आज शासन से ज्यादा “कथानक नियंत्रण” पर है — कौन बोले, मीडिया क्या दिखाए, जनता क्या सुने — यह सब तय होना चाहिए।

एक सशक्त विपक्ष सवाल लाता है, और सवाल जवाबदेही मांगते हैं। इसलिए विपक्ष को हाशिए पर रखना आसान विकल्प बन गया है। कमजोर विपक्ष जनता को बिखरा रखता है, और बिखरी जनता सत्ता के लिए हमेशा सुविधाजनक होती है।

मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की आंखें हैं। जब आंखें बंद कर दी जाएं, तो अंधकार सत्ता का साथी बन जाता है।

विपक्ष को कमजोर करना सत्ता की चतुराई नहीं, लोकतंत्र की कमजोरी है। और आलोचना से डरना आस्था की नहीं, असुरक्षा की निशानी है। एक सच्चा लोकतंत्र वही होता है जहां सत्ता और विपक्ष दोनों एक-दूसरे को कमजोर नहीं, जवाबदेह बनाते हैं।

“भाजपा सरकार विपक्ष को सशक्त बनाने के मुद्दे पर पिछड़ी क्यों नजर आ रही है?”
🔴 1. क्योंकि सरकार अब “सत्ता = स्थायित्व” मानने लगी है
भाजपा बीते एक दशक से लगातार सत्ता में है, और उसके भीतर यह धारणा गहराई तक बैठ गई है कि “विकल्प का मतलब अस्थिरता” है।
इसीलिए विपक्ष को सशक्त बनाना अब उन्हें राजनीतिक जोखिम लगता है, लोकतांत्रिक ज़रूरत नहीं।सत्ता जितनी लंबी चलती है, उतना ही विपक्ष को बराबरी का मंच देना असुविधाजनक हो जाता है!
⚫ 2. क्योंकि सत्ता की राजनीति अब ‘वर्चस्व’ पर टिकी है, ‘संवाद’ पर नहीं
भाजपा की पूरी रणनीति अब ‘नैरेटिव कंट्रोल’ (कथानक नियंत्रण) पर आधारित है —यानी कौन क्या बोले, मीडिया क्या दिखाए, जनता क्या सुने — सब कुछ नियंत्रित रहे।विपक्ष को सशक्त करने का मतलब होगा, “एक दूसरा नैरेटिव जनता तक पहुंचने लगे।”
और यही बात सरकार के लिए असुविधाजनक है।
🟠 3. क्योंकि मजबूत विपक्ष ‘सवाल’ लाता है, और सवाल जवाबदेही मांगते हैं
आज की शासन शैली “विकास की कहानी” सुनाना चाहती है,जवाब देने की जगह नहीं चाहती।यदि विपक्ष मजबूत होगा तो वह —भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,महंगाई जैसे सवालों को बार-बार उठाएगा।
सरकार इन सवालों से बचने के लिए विपक्ष को हाशिए पर रखना ही आसान समझती है।
🟢 4. क्योंकि कमजोर विपक्ष जनता को विभाजित रखता है
जब विपक्ष बिखरा होता है, तब जनता के बीच एक “सत्ता बनाम अराजकता” का भ्रम बनाया जा सकता है।भाजपा इस विभाजन को बहुत रणनीतिक ढंग से साधती है —> “एक मजबूत विपक्ष का मतलब होगा एकजुट जनता।”और सत्ता के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है।
⚖️ निष्कर्ष
भाजपा सरकार विपक्ष को सशक्त बनाने में पिछड़ी नहीं —जानबूझकर पीछे रहना उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।लोकतंत्र में विपक्ष को कमजोर करना सत्ता की मजबूती नहीं,लोकतंत्र की जड़ काटने जैसा है।
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