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मीडिया मैनेजमेंट और पत्रकारों से भेदभाव?

व्हाट्सएप और सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर हाल ही में गाडरवारा में हुए वालीबॉल प्रतियोगिता में पत्रकारों के साथ किए गए भेदभाव पर चर्चाएं चल रही हैं!

किसी को 20000 मिले तो किसी को 10000 और किसी को 5000 से लेकर 3000 तक! कुछ को 2000 में ही संतोष करना पड़ा! यह पूरा मामला प्रिंट मीडिया पत्रकारों के बीच हुए भेदभाव का दिख रहा है?

रही बात नरसिंहपुर जिले के डिजिटल मीडिया पत्रकारों की — तो वे इस दौड़ में शामिल ही नहीं हैं!वैसे भी नरसिंहपुर जिले में डिजिटल मीडिया पत्रकारों की (जिनकी गिनती उंगलियों पर गिनने लायक है!) तो उन्हें डोनेशन से ही काम चलाना पड़ता है और वह भी सबको नहीं मिलता!अब इसे विज्ञापन कहो या डोनेशन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता!

उनका कामकाज एडसेंस, डोनेशन और व्यापारिक विज्ञापनों पर ही चलता है!स्थानीय संगठन से मिलने वाली आर्थिक सहायता और गूगल AdSense से औसत लाभ मिलता है, लेकिन गूगल AdSense का अप्रूवल भी सभी को नहीं मिलता। इसलिए अगर ये कहें कि इस विवाद की होड़ और प्रतिस्पर्धा पूरी तरह प्रिंट मीडिया के भीतर ही सीमित है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

प्रिंट मीडिया में ही भेदभाव की चर्चा क्यों?

बात तो खास यह है कि प्रिंट मीडिया पत्रकारों में ही आपस में भेदभाव किया गया! अलग-अलग लिफाफे अलग-अलग प्राथमिकता और अलग-अलग व्यवहार — यह सवाल खड़े करता है कि आखिर यह व्यवस्था बनती कैसे है?

"ऐसा क्या है करेली के मैनेजमेंट में कि जब भी कोई बड़ा आयोजन होता है तो विज्ञापन का लंगर करेली में ही लगता है?"

क्या आपको पिछले चुनाव याद हैं? तब भी लंगर और मैनेजमेंट को लेकर ऐसी ही बंदरबांट की चर्चाएं सामने आई थीं!

तो सवाल उठता है…

गाडरवारा का मीडिया मैनेजमेंट करेली से क्यों हुआ? और प्रिंट मीडिया के बीच इतनी असमानता आई ही क्यों?

प्रिंट मीडिया के भीतर की ‘अनकही होड़’

इस पूरी घटना ने प्रिंट मीडिया की उस अंदरूनी होड़ को उजागर कर दिया है, जिसमें –

  • बड़े अखबारों से जुड़े पत्रकारों को ‘प्राथमिकता’
  • छोटे या स्थानीय स्तर के पत्रकार पीछे
  • विज्ञापन वितरण में सीनियरिटी और प्रभाव का खेल

क्या प्रिंट मीडिया में एक ‘अनौपचारिक क्लास सिस्टम’ बन गया है? यह वही सवाल है, जो अब खुलकर उठ रहा है।

“मैनेजमेंट-फ्रेंडली” लाइन आगे और मेहनत करने वाले पत्रकार पीछे — यह मॉडल कब तक?

अब आगे क्या?

जिले में एक पारदर्शी, समान और स्पष्ट मीडिया व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अब देखना यह है कि –

  • क्या प्रिंट मीडिया के लिए समान मानक तय होंगे?
  • क्या पत्रकार स्वयं मिलकर कोई ठोस नियम बनाएंगे?

गाडरवारा की यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि मीडिया मैनेजमेंट की कहानी सिर्फ अंदर ही अंदर चलने वाली बात नहीं रही — अब यह खुलकर सामने है।

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