नाली की कीचड़ में सोना निकालने वालों की अनकही जिंदगी
हाथों में कीचड़, आँखों में उम्मीद
मैं नाली के किनारे पहुँचा। कीचड़ में पाँव धंसते रहे, बदबू इतनी घनी थी कि साँस लेना मुश्किल हो गया। वहां कुछ लोग थे, उनके हाथ गंदगी से सने हुए, चेहरे पर थकान और उम्मीद दोनों झलक रही थी।
मैंने पास जाकर पूछा, “भाई, रोज़ यह कैसे करते हो?”
रामू: “भाई, कोई और काम नहीं है। बच्चों को स्कूल भेजना है, घर चलाना है। यही रास्ता बचा है। कभी-कभी घंटों की मेहनत में सिर्फ छोटा सा टुकड़ा सोना मिलता है। बाकी सब समय गंदगी और कीचड़ में ही गुजरता है।”
उनके हाथ, झाड़ियों और रेत के बीच लगातार हिल रहे थे। वे पहले कीचड़ से बड़े कण अलग करते, फिर छन्नी और छोटे झाड़ू से रेत छानते। हर बार जब मिट्टी में चमकता टुकड़ा दिखाई देता, उनका चेहरा थोड़ी देर के लिए खिल उठता।
पास ही एक महिला काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा कि डर नहीं लगता?
सीमा: “डर तो है, लेकिन परिवार के लिए डर भी सहना पड़ता है। बारिश हो या धूप, हम रोज़ यही करते हैं। लोग हमें अजीब समझते हैं, लेकिन हमें अपनी मेहनत का फल चाहिए। बच्चों के लिए करना पड़ता है।”
एक बच्चा भी उनके साथ था। उसकी आँखों में जिज्ञासा और उम्मीद दोनों थी। उसने छोटी-छोटी रेत की ढेरियों में हाथ डालते हुए पूछा, “माँ, क्या यह सच में सोना है?”
सीमा: “हाँ बेटा, मेहनत का इनाम यही है।”
मैंने देखा कि यह केवल रोज़गार नहीं है; यह जीवन की जंग है। हर टुकड़ा सोना उनके लिए सिर्फ धातु नहीं, बल्कि उम्मीद, आजीविका और संघर्ष का प्रतीक है।
जितनी मेहनत, हिम्मत और धैर्य वहाँ दिख रहा था, उससे साफ था कि यह लोग समाज की नजरों से अदृश्य हैं। हमारी चमक-धमक वाली दुनिया में उनकी जिंदगी, उनके संघर्ष, उनकी उम्मीद — सब छिपा हुआ है।
नाली में सोना छुपा हो सकता है, लेकिन इन लोगों की मेहनत और जुझारूपन उससे भी कीमती है। उनकी मुस्कान, जो गंदगी और कीचड़ के बीच खिलती है, यह बताती है कि सच्ची हिम्मत हमेशा अपनी जगह बनाती है, चाहे हालात कितने भी कठिन हों।
— ग्राउंड रिपोर्टिंग: Stringer24 News

