नर्मदा किनारे बसा नरसिंहपुर, दिन में जितना शांत और आत्मीय लगता है, रात में कभी उतना ही डरावना हुआ करता था। बुजुर्ग अब भी बताते हैं कि जब पिंडारी टोलियाँ सक्रिय थीं, तो गाँव-गाँव में रात का अंधेरा भय लेकर आता था।
कहा जाता है, जैसे ही सूरज ढलता और परिंदे अपने घोंसलों को लौटते, गाँव की चौपाल पर बेचैनी छा जाती। “कहीं पिंडारी न आ जाएँ!” यह डर हर दिल में था। लोग अपने मवेशी, अनाज और औरतों-बच्चों को सुरक्षित जगहों पर छिपा देते।
गोटेगांव की लोककथाओं में अब भी सुनाई देता है कि कैसे पिंडारी घोड़ों पर सवार होकर गाँवों पर टूट पड़ते थे। धावा बोलते ही मवेशी हाँक ले जाना, घरों में लूटपाट और चौपालों को जला देना आम बात थी। करेली और आसपास के गाँवों में भी पिंडारियों का आतंक इतना था कि लोग रात में दीपक जलाने तक से डरते थे।
नरसिंहपुर के बुज़ुर्ग पिंडारियों के दो नाम अक्सर याद करते हैं – चिंटू खान और करीम खान। कहा जाता है कि ये दोनों अपने गिरोह के साथ नर्मदा के घाटों पर टिकते और रात में डकैती की योजना बनाते। लोककथाओं में ये नाम डर और रहस्य दोनों का प्रतीक बने हुए हैं।
पिंडारियों के किस्से सिर्फ लूट-खसोट तक सीमित नहीं रहे, बल्कि बच्चों को डराने वाली कहानियों का हिस्सा भी बन गए।
“जल्दी सो जाओ, नहीं तो पिंडारी आ जाएगा” – यह वाक्य नरसिंहपुर के गाँवों में लंबे समय तक सुना जाता रहा।
आज जब नरसिंहपुर की रातें शांत हैं, तब भी ये किस्से याद दिलाते हैं कि कभी इस धरती पर अंधेरा सचमुच खौफ का दूसरा नाम हुआ करता था।
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