"आंकड़ों में सस्ती महंगाई, मगर बाजार में सन्नाटा"
✍️ रिपोर्ट: विक्रम सिंह राजपूत | 📍 नरसिंहपुर–गाडरवारा
नरसिंहपुर। तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है — मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबों का है। कागज़ी दुनिया में सब कुछ संतुलित दिखता है, लेकिन ज़मीन पर कहानी कुछ और है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के मुताबिक़ सितंबर में खुदरा महंगाई दर आठ सालों में सबसे निचले स्तर पर रही — ये आंकड़े देखकर लग सकता है कि अब आम आदमी को राहत मिली है। लेकिन जब Stringer24 News की टीम ज़मीन पर उतरी, तो लोगों की बातें सुनकर अहसास हुआ कि राहत आंकड़ों में है, ज़िंदगी में नहीं।
💬 "त्योहार आया है, पर ग्राहकी नहीं"
गाडरवारा के मुख्य बाजार में दीपावली की तैयारियां तो हैं, लेकिन वह चहल-पहल नहीं जो पहले हुआ करती थी। मिठाई की दुकानों पर हल्की भीड़ है, पर खरीददारी करने वाले कम हैं।
यहां के एक कपड़ा व्यापारी राजेश अग्रवाल बताते हैं — "लाडली बहना का पैसा तो सरकार ने डाल दिया, लेकिन हमारे यहां जो सरकारी कर्मचारी आते थे, उनमें से कई का वेतन अभी तक नहीं हुआ। जिन विभागों में वेतन नहीं आया, वहां के कर्मचारी कैसे खरीदारी करेंगे? बाजार पर असर तो पड़ेगा ही।"
🍎 "महंगाई आंकड़ों से नहीं, जेब से मापी जाती है"
नरसिंहपुर की सब्ज़ी मंडी में रमेश पटेल से बात हुई, जो पिछले 15 सालों से फल बेच रहे हैं। वे हंसते हुए कहते हैं — "सरकार कहती है महंगाई कम हुई है, पर आम आदमी को क्या मिला? जिनकी तनख्वाह दो-दो महीने से नहीं आई, उन्हें अब एक-दो महीने का वेतन देकर फिर चुप करा दिया जाता है। अब आदमी त्यौहार पर ही सारा पैसा खर्च कर देगा तो बाकी महीनों में क्या करेगा?"
उन्होंने बताया कि सेब, अनार और केला जैसी चीजें पहले की तुलना में 10-15 रुपये प्रति किलो तक महंगी हैं, लेकिन ग्राहक पूछते ज़्यादा हैं, खरीदते कम हैं।
🪔 "दीपावली में रोशनी तो है, पर रौनक नहीं"
गांवों और तहसीलों में इस बार दीपावली की खरीददारी धीमी है। दुकानदारों की नज़र अब सिर्फ इस उम्मीद पर टिकी है कि अंतिम दो दिनों में भीड़ बढ़ेगी। लेकिन जो संकेत दिख रहे हैं, वे बताते हैं कि इस बार त्योहार की अर्थव्यवस्था कुछ थमी-थमी सी है।
एक गृहिणी सविता यादव ने कहा — "सरकार कहती है सब कुछ सस्ता हुआ, पर बाज़ार में दाम वही हैं। तेल, गैस, दूध — कुछ भी सस्ता नहीं दिखा। त्योहार तो बच्चों के लिए ही मना रहे हैं, वरना जेब तो खाली है।"
📉 आंकड़ों और असलियत के बीच की खाई
आंकड़ों में चाहे महंगाई ‘नियंत्रण’ में दिखे, लेकिन वास्तविकता में गांव से लेकर कस्बों तक लोग महसूस कर रहे हैं कि उनकी क्रयशक्ति अब भी कमजोर है। सरकारी रिपोर्टें जो कह रही हैं, वह ‘किताबी सच्चाई’ है — मगर ज़मीन की कहानी अलग है।
📍 गाडरवारा | नरसिंहपुर | तेंदूखेड़ा क्षेत्र
🎙️ पंचायत रेडियो – एक गांव, एक कहानी विशेष श्रृंखला


