Stringer24 News | संवाददाता रिपोर्ट - नरसिंहपुर
ग्राम पंचायत सचिवों की मनमानी और अनियमितता ने गांव के विकास की जड़ें हिला दी हैं। नरसिंहपुर जिले की अधिकांश ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर बजट का दुरुपयोग आम बात हो गई है। अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं और पंचायत प्रतिनिधि कमाई के लालच में नियम-कायदे ताक पर रख चुके हैं।
जनपद पंचायत चिचली के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मोहपानी इसका ताजा उदाहरण है, जहां सचिव की मनमानी और कारस्तानियां ग्रामीणों की चर्चा का विषय बन चुकी हैं। यहां सचिव ने सरपंच को महज़ ‘रबर स्टैंप’ बनाकर जनहित योजनाओं को अपने निजी लाभ का जरिया बना लिया है। निर्माण कार्यों में हेराफेरी, फर्जी बिल-बाउचर और मस्टर रोल में गड़बड़ी के आरोप खुलेआम लगाए जा रहे हैं।
मनरेगा मजदूरी डकारने वाले फर्जी मजदूरों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि प्रलोभन स्वीकार कर उन्होंने सचिव के इशारे पर चलना स्वीकार कर लिया है। अधिकारी कमीशन के लालच में चुप्पी साधे हुए हैं और ग्राम पंचायत में हो रहे गबन को मूकदर्शक बनकर देख रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि जनपद सीईओ को हर काम पर तय रकम बतौर ‘कमीशन’ दी जाती है, जिसके एवज में वे बिना बिलों की जांच किए हस्ताक्षर कर देते हैं। Stringer24 News संवाददाता ने जब उनसे संपर्क साधने की कोशिश की, तो बार बार फोन किए जाने पर भी संपर्क नहीं हो पाया।
आखिर किसके इशारे पर चुप जनपद सीईओ?
क्या सचिव पर कार्रवाई से बचाने के लिए ये सब खेल खेला जा रहा है? गबन के आरोपों में क्या सचिव पर भी जांच की गाज गिर सकती है? इन सवालों के जवाब प्रशासनिक तंत्र की फाइलों में दफन हैं।
शिकायतों और गांव के हालात को नज़रअंदाज़ करने की वजह से ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। अधिकारी कभी-कभार दिखावे की कार्रवाई करते हैं, मगर सच्चाई वही पुरानी — मनमानी, लापरवाही और अराजकता का खेल जारी है।
ऐसे अनेक मामले हैं जब जिला पंचायत से जांच और कार्रवाई के आदेश बार-बार आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी टालमटोल में लगे हैं। जिन मामलों की जांच हफ्तों में पूरी होनी चाहिए थी, वे महीनों से फाइलों में अटकी हैं और नतीजा — सिफर!
गांव के चौपालों पर सचिव की कारस्तानियां अब रोज़ का विषय हैं। भ्रष्टाचार की यह फेहरिस्त हर दिन लंबी होती जा रही है।
जिला कलेक्टर नरसिंहपुर
भले ही कलेक्टर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के दावे करें, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। स्थानीय प्रशासन के अफसरों के लालच और सांठगांठ ने सिस्टम को पंगु बना दिया है। सवाल उठता है — क्या गांव का विकास हमेशा सचिवों और सरपंचों की ‘कमीशन राजनीति’ की भेंट चढ़ता रहेगा?
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