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✒️ संपादकीय : जब आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, तो जवाब कौन देगा?

आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं — यह केवल हमारा वर्तमान नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी है। हम अपने समय के साक्षी हैं, लेकिन कल जब इतिहास लिखा जाएगा, तब सवाल भी हमसे ही किए जाएंगे। और तब शायद, जवाब देने वाला कोई न होगा।

जब नदियाँ सूख रही थीं, तब हमने मौन साध लिया। जब खेतों की मिट्टी ज़हर बन रही थी, तब हमने कहा – “हम क्या कर सकते हैं?” जब शिक्षा व्यापार बनी और न्याय बिकने लगा, तब हमने समझौता कर लिया। यही वह चुप्पी है जो कल का इतिहास सबसे ज़्यादा याद रखेगा।

आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी – जब सच्चाई दबी, तब कौन उठा था? जब पत्रकारों को डराया गया, तब कौन बोला था? जब गाँवों की सड़कें भ्रष्टाचार के दलदल में फँस रही थीं, तब किसने सवाल किए? और जब इंसानियत मिट रही थी, तब किसने उसे बचाया?

एक लेखक के तौर पर मैं जिस समाज को देख रहा हूं, वह विरोधाभासों से भरा समाज है — जहाँ हर किसी के पास “विचार” हैं, मगर “विचार करने का समय” नहीं। लोग बोलना चाहते हैं, पर डरते हैं कि कहीं कोई सुन न ले। जहाँ तर्क को ताने समझ लिया गया है, और असहमति को अपराध। यहाँ लोग सच सुनना नहीं चाहते, वे केवल वही सुनना चाहते हैं जो उन्हें सुकून दे।

यह वह समाज है जहाँ मंदिरों की भीड़ है, पर मनुष्यता अकेली है। जहाँ सत्ता का भय इतना गहरा है कि झूठ को नीति और सच को नादानी कह दिया जाता है। जहाँ बच्चों को इतिहास तो पढ़ाया जाता है, पर सवाल पूछने की हिम्मत नहीं दी जाती। जहाँ साहित्य को मनोरंजन समझ लिया गया है, और पत्रकारिता को केवल “कंटेंट” बना दिया गया है।

लेखक का काम केवल लिखना नहीं, समाज के मौन को शब्द देना है। मगर आज कलम थक चुकी है — न इसलिए कि स्याही खत्म हुई, बल्कि इसलिए कि हर सच्ची पंक्ति अब किसी न किसी डर से लिखी जाती है। लेखक के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है — “क्या शब्द अब भी परिवर्तन ला सकते हैं, या वे केवल दीवारों पर गूंज बनकर रह जाएंगे?”

हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ सुविधा ने संवेदना को निगल लिया है। लोग फटे जूतों वाले किसान पर नहीं, ब्रांडेड जूतों वाले नेता पर तालियाँ बजाते हैं। सच अब भावनाओं से नहीं, ट्रेंड्स से तय होता है। और यही वह खतरा है जो आने वाली पीढ़ियों की चेतना को सबसे पहले कुंद करेगा।

पर आशा अभी भी है — जब तक कोई एक व्यक्ति सवाल करने की हिम्मत रखता है, जब तक कोई पत्रकार अपनी रिपोर्ट में सच्चाई का नाम लिखने की जुर्रत करता है, जब तक कोई लेखक अपने शब्दों से समाज की आँखों में झाँकता है — तब तक जवाब जीवित रहेंगे।

सवाल यह नहीं कि कौन दोषी है — सवाल यह है कि कौन ज़िम्मेदार है। क्योंकि जब आने वाली पीढ़ियाँ यह पूछेंगी, “आपके दौर में सच कहाँ था?” तब शायद जवाब में केवल सन्नाटा होगा… या कुछ बची हुई रिपोर्टें, जिन पर लिखा होगा —

  “Stringer24News – सच की ज़िद।” लेखक/पत्रकार:विक्रम सिंह राजपूत 

© Stringer24News | पंचायत रेडियो संपादकीय डेस्क
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