*“धर्म, राजनीति और कुप्रथाएं : आदिवासियों की रूह हिलाने वाली कहानी”*
आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव में है। बदलते समय के साथ भले ही आदिवासी जीवन में शिक्षा, तकनीक और रोज़गार की नई राहें खुल गई हों, लेकिन उनका लगाव पहाड़ों और जंगलों से आज भी उतना ही मजबूत है जितना सदियों पहले था।
पहाड़ उनके लिए सिर्फ़ पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि जीवंत धरोहर हैं। ये पहाड़ ही उन्हें जल, जंगल और जमीन का आधार देते हैं। आदिवासी मानते हैं कि पहाड़ उनका संरक्षक है—वही उन्हें बारिश देता है, खेती की उपजाऊ मिट्टी देता है और जीवन जीने की प्रेरणा भी।
बदलते परिवेश में अब कई आदिवासी शहरों का रुख कर रहे हैं, शिक्षा प्राप्त कर नई नौकरियों में कदम रख रहे हैं। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने भी उनकी सोच और जीवनशैली को आधुनिक बनाया है। फिर भी, त्यौहारों, रीति-रिवाजों और पूजा-अर्चना में पहाड़ आज भी केंद्र में हैं। उनका मानना है कि जब तक पहाड़ जीवित हैं, उनकी संस्कृति भी जीवित रहेगी।
पहाड़ों के साथ उनका यह रिश्ता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आदिवासी समुदाय पहाड़ों की रक्षा को अपना कर्तव्य मानते हैं और यही वजह है कि जिन क्षेत्रों में आदिवासी रहते हैं, वहां आज भी प्राकृतिक संपदा संरक्षित दिखाई देती है।
इस तरह, आदिवासी जीवन में बदलाव भले ही आया हो, लेकिन उनकी आत्मा अब भी पहाड़ों की गोद में बसती है। यही उनकी असली पहचान है और यही उन्हें दुनिया से अलग भी करती है।
आदिवासी जीवनशैली में समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, दुनिया बदली, लेकिन अफसोस यह है कि उनकी सोच अभी भी वहीं की वहीं अटकी हुई है। धर्म और राजनीति को लेकर आदिवासी समाज का दृष्टिकोण आज भी निराशावादी है। विश्वास और आस्था की आड़ में वे खुद को बार-बार धोखा दे रहे हैं।
आज भी कई आदिवासी इलाकों में पुरानी कुप्रथाएँ मजबूती से जमी हुई हैं। “दागना प्रथा” इसका सबसे भयावह उदाहरण है। ज़रा सोचिए, 21वीं सदी में भी जब दुनिया चांद और मंगल पर घर बनाने की बात कर रही है, तब भी मासूम औरतों व बच्चों की त्वचा पर लोहे को तपाकर दागने जैसी बर्बरता जारी है। यह न सिर्फ अज्ञानता है बल्कि अमानवीयता की हद है।
धर्म और राजनीति के नाम पर आदिवासी समुदाय को हमेशा भटकाया गया है। नेताओं ने उन्हें वोट बैंक बनाकर रखा, ठेकेदारों ने उनकी मेहनत का शोषण किया, और बाबाओं-पंडों ने आस्था के नाम पर उन्हें जंजीरों में जकड़ दिया। परिणाम यह है कि शिक्षा, रोज़गार और आधुनिकता की लहर वहाँ जाकर भी ठहर जाती है।
सवाल उठता है—कब तक? कब तक आदिवासी समाज अपने बच्चों का भविष्य इन अंधविश्वासों की बलि चढ़ाता रहेगा? कब तक “परंपरा” के नाम पर यह समाज प्रगति की दौड़ से बाहर रहेगा?
जरूरत है कि इस सोच को बदला जाए। आदिवासी युवाओं को आगे आकर इन कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। वरना धर्म और राजनीति के नाम पर गुमराह करने वाले लोग हमेशा उन्हें वहीं का वहीं रोक देंगे—बीते जमाने की अंधेरी गलियों में।
