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*ऐसे लेखक को तो सूली पर चढ़ा देना चाहिए?*

।। रविवारीय विशेषांक।।

और किया भी क्या जा सकता है?यदि भ्रष्टाचार को बचाना है तो फिर ऐसे लेखक को सूली पर चढ़ाना ही होगा! वर्ना यह कलम की आग न जाने क्या क्या खाक कर दे!

और फिर सबसे अहम बात कि ऐसे लेखक का गुनाह क्या है? सोए हुए लोगों को जगाना! यह तो बड़ा ही संगीन जुर्म है! ऐसा भी कोई करता है क्या? सोए हुए लोगों को जगाना क्यों?

उनके अधिकार उन्हें नहीं चाहिए,उन्हें उनके गांव का विकास नहीं चाहिए, उन्हें बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं खलती है तो फिर इस लेखक को क्या पड़ी है?

जरूरत ही क्या है लोकतंत्र और संविधान की चिंता करने की? जरूरत ही क्या है गरीब,कमजोर,शोषित की आवाज उठाने की? अरे गांव में होता है भ्रष्टाचार तो होने दो!

भ्रष्टाचार मिटाने की किसी एक की जिम्मेदारी है क्या?और फिर जो लोग खुद के लिए नहीं कभी बोल सके,वो समय आने पर लेखक के साथ क्या खड़े हो पाएंगे?इसलिए जो होता है,होने दो!

और फिर इन तमाम बातो मसलों का हल क्या है?कुछ नहीं! सदियों से यह सिलसिला यूं ही चला आ रहा है!पूंजीवादी ताकतें अपने सत्ता और पद का दुरुपयोग अपने लाभ और स्वार्थ के लिए करती रहीं हैं!

हां सवाल करके और आलोचना करके अलबत्ता लेखक /कलमकार अपने अनेक विरोधी बना लेते हैं!क्या लेखक/कलमकारों के परिवार नहीं हैं? एक मुर्दा समाज को जगाने के लिए कितने लोगों की बलि लगेगी?और जो सदियों से आज तक नहीं जागे,उनके लिए रोज होने वाली मौतों जैसी ही है एक लेखक/कलमकार के मरने की खबर? उन्हें तो शाहिद का दर्जा भी नहीं मिलता!

जारी :


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