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गरीब की थाली!: मंहगाई ने कर दी खाली!

सरकार ने व्यापारियों से चंदा लिया है तो,कहीं तो वसूल करेंगे ही!

चुनाव तो हो गए, ,सरकारें भी बन गई, , सरकारों ने पूंजीपत व्यापारियों से भी दिल खोलकर चंदा लिया! अब जब सरकारों को इन पूंजीपति व्यापारियों ने चंदा दिया है तो स्वाभाविक है कि, यह चंदा व्यापारिक हितों को मद्देनजर रखते हुए ही दिया होगा! तो फिर ऐसे में कहीं न कहीं तो यह पैसा वसूल किया जाएगा!

सरकार और पूंजीपति व्यापारी वर्ग ने जो आपस में हाथ मिलाया है, गरीब तो समझ भी नहीं सका कि,सरकार ने कैसे लट्टू घुमाया है!

लाडली बहना के नाम पर प्रदेश की लगभग दो लाख से अधिक महिलाओं को 1250 रुपए दे रही है!जिससे सरकारी खजाने पर 1600 करोड़ रुपए का भार पड़ रहा है!वहीं सरकार अब तक कर्ज के बोझ में दबी हुई है!

अब एक तरफ १२५० रुपए दो और दूसरी तरफ यह कहकर लूट लो कि बाजार की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है और मंहगाई तो देश भक्ति के लिए जरूरी भी है!

मंहगाई से जूझ रही निम्न मध्यम वर्गीय, मध्यम वर्गीय महिलाओं को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और घर के बजट को सम्हालने के लिए कौन सी जुगत लगा रही है 

stringer24news संवाददाता ने जिले के शहरी एवम विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं से वार्ता कर यह जानने की कोशिश की,आखिर वे बजट एडजस्ट करने के लिए किस तरह की कटौतियां कर रही हैं।

राशन की बढ़ती क़ीमत, सिलेंडर और सब्ज़ियों के बढ़ते दाम ने मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय घर के परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है।

38 वर्षीय गृहणी मालती जी का कहना है की,घर ख़र्च को आमदनी के अंदर रखने के लिए इन्होंने बच्चों के जन्मदिन और त्योहारों पर अपनी ख़्वाहिशों पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया है।

वहीं बुटीक संचालक 29 वर्षीय निकिता जी का कहना है की, बढ़ती हुई मंहगाई के कारण थाली के स्वाद और सेहत पर भी असर पड़ रहा है।

विनिता के पति पेशे से मजदूर हैं।कभी कभी तो इतना काम भी नहीं मिल पाता है की महीने भर का गुजर बसर हो सके। विनिता कहती हैं,ऐसे में हम क्या कमाएं और क्या खाएं?

बरसात के दिनों में निर्माण कार्यों की गति अपेक्षाकृत धीमी हो जाती है,जिससे ठीक तरह से ना काम ही मिलता है ना ही मजदूरी।बच्चों की ट्यूशन बंद कर दी ,सब्जियों के बढ़ते हुए दामों को वजह से सिर्फ एक टाइम ही सब्जी बनाना पड़ रही है।वह कहती हैं कि पिछले कुछ महीनों में जिस क़दर सारी चीज़ों की क़ीमतें बढ़ी हैं उसमें कई बार उधार लेने की नौबत आ गई है।

प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका के तौर अपनी सेवाएं देने वाली प्राची का कहना है की, बचत में से कटौती करने का तो सवाल ही पैदा नही होता,क्यों की वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों ने बचत को वैसे ही कम कर दिया है,जिस अनुपात में मंहगाई बढ़ी है, उस अनुपात में आय नही बढ़ी।नतीजतन सीमित आय में घर के बजट को सम्हालने की जिम्मेदारी।दवाई और खान पान पर कटौती करना संभव नहीं है,इसलिए क्वांटिटी और क्वालिटी को कंट्रोल करना पड़ता है।बच्चों के साथ बाहर खाना और त्योहारों में कपड़े ख़रीदना कम कर दिया है।घर पर दोस्तों की दावत भी कम हो गई है।

53 वर्षीय सरोज बाई के पति के देहांत के बाद तीनों बच्चों की परवरिश का भार सरोज के कांधों पर आ गया था। घर में कोई जमा पूंजी नही थी,तो सरोज को स्थानीय मार्केट के एक शॉप में चार हजार रुपए मासिक वेतन पर काम करना पड़ा।सरोज कहती हैं कि,अब इतने में ना तो ठीक तरह से खाद्य सामग्री खरीदी जा सकती है,और ना ही दैनिक आवश्यकता की अन्य वस्तुएं।बातचीत जारी रखते हुए सरोज ने कहा कि,दिल तो करता है बच्चों को दोनो समय गर्मागर्म भोजन पकाकर खिलाऊं,लेकिन मंहगाई के चलते बजट नियंत्रण से बाहर हैं।

41 वर्षीय समा घरों में साफ सफाई का काम करती हैं, वे बताती हैं की,कई बार तो घरों से बचा हुआ खाना मिल जाता है, तो बच्चों की भूख मिट जाती है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता,कई बार परिवार को फाकाकशी भी करनी पड़ती है। समा कहती हैं कि इस समय मेरे पास तीन घरों का काम है,ऐसे में मेरी कमाई इतनी नही है की,दोनो समय का खाना पका सकूं।बजट ना बिगड़े इस वजह से ही परिवार ने दूध की खरीदी भी बंद कर दी है।

घर के बजट को बनाए रखने की यह एक ऐसी जंग है,जिसे हर आम नौकरी पेशा नागरिक को लड़ना पड़ रही है। मंहगाई के इस दौर में क्या ग़रीब और क्या मध्यम वर्ग, हर तबक़े का आदमी परेशान है।

चार लाख करोड़ के कर्ज में डूबी मध्य प्रदेश सरकार की नैया पार मोहन कैसे पार लगाएंगे, जबकि कर्ज की राशि का एक बड़ा हिस्सा पूर्व सरकार से विरासत में मिला है! प्रदेश की 1 करोड़ 29 लाख महिलाओं को लाडली बहना योजना की राशि उनके खातें में भेजी जाती है।

लाडली बहना योजना पर सरकार को तकरीबन "सोलह सौ करोड़" रूपए का भार वहन करना पड़ रहा है!वहीं लाडली बहना को सस्ता गैस सिलेंडर देने पर खजाने पर 160 करोड़ रुपए का भार पड़ रहा है!

विश्लेषकों के मुताबिक सरकार 5 हजार करोड़ का कर्ज लेने जा रही है, राज्य में चल रही फ्री योजनाएं कहीं इसकी वजह तो नहीं है? हालाकि यह कर्ज दो चरणो में लिया जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ और बढ़ जाएगा! इतना ही नहीं बल्कि इन सबके बीच मध्य प्रदेश में रहने वाले प्रति व्यक्ति पर लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है! जो अब तक तकरीबन पैंतीस हजार प्रति व्यक्ति तक पहुंच गया है!

स्थिती यह है कि, मोहन सरकार ने पिछले छह महीनों के दौरान तकरीबन ग्यारह से अधिक बार लोन ले लिया है! इसका असर बाजार की मंहगाई पर दिखाई दे रहा है? आलम यह है कि, सरकारी आंकड़ों में घटती मंहगाई आम जनता को महसूस नही हो पा रही है!

आप खुद ही मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का हाल देख लीजिए, वर्ष 2023=24 के आंकड़ों को देखे तो,केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के एमआईएस पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, योजना के तहत आने वाले केवल 2 प्रतिशत परिवार ही 100 दिनों का काम पूरा करने में सफल रहे जबकि अधिकांश श्रमिकों को औसतन 50 दिनों से कम समय के लिए रोजगार मिला।

इसी तरह ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य और सेवा सुविधाएं भी बदहाल स्थिति में हैं। कितने ही स्कूल भवन जर्जर हालत में है, शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है।वहीं आज भी ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर ढूंढे से नहीं मिलते हैं। चन्द अपवादों की अगर बात छोड़ दी जाए तो अधिकांश उप स्वास्थ्य केंद्र महज शोभा की सुपारी साबित हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के पद खाली क्यों पड़े हैं और इन्हें भरने की क्या योजना है?बदहाल हो रही स्वास्थ्य सेवाओं से निपटने के क्या इंतजाम हैं?

हालाकि सरकार के दावे तो बहुत हैं,लेकिन धरातल पर स्थितियां विपरीत दिखाई दे रही है। वास्तविकता यह है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र भगवान भरोसे चल रहे हैं!











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